तो क्या आर्यभट्ट ने नहीं किया था शून्य का आविष्कार?
भारतीय गणितज्ञ वर्षों से ये दावा करते रहे हैं कि शून्य का अविष्कार भारत में किया गया था। हालांकि अमेरिका के एक गणितज्ञ कहना है कि शून्य का आविष्कार भारत में नहीं हुआ था। अमेरिकी गणितज्ञ आमिर एक्जेल ने सबसे पुराना शून्य कंबोडिया में खोजा है।
'फाइंडिंग जीरो: ए मैथिमैटिशियंस ओडिसी टू अनकवर द ओरिजिन ऑफ नंबर' पुस्तक को डॉ आमिर एक्जेल ने लिखा है। इस किताब में उन्होंने दावा किया है कि सबसे पुराना शून्य भारत में बल्कि कंबोडिया में मिला था।
इस किताब में लिखा गया है कि पयर्टकों के लिए उत्तर भारत का एक छोटा सा शहर खजुराहो हमेशा से उत्सुकता का केंद्र रहा है। उत्तर भारत के इस शहर में हजारों साल पुराने जैन और हिदुंओं के मंदिर हैं। यह मंदिर उत्सुकता का केंद्र इसलिए भी रहते हैं क्योंकि यहां मंदिरों की दीवारों पर यौनरत मूर्तियों के जरिए काम-कलाओं का प्रदर्शन किया गया है।
पर जब लेखक और गणितज्ञ आमिर एक्जेल वर्ष 2011 में यहां की यात्रा पर आए तो उन्हें किसी और ही चीज की तलाश थी। घंटों तक मंदिर में भटकने के बाद उन्होंने एक देखा कि एक कामुक जोड़े का मैजिक स्क्वायर के रूप में चित्र दीवारों पर बना हुआ है।
इस मैजिक स्क्वायर के सभी 16 अंकों में हिंदू अंक '10' को आसानी से पहचाना जा सकता है। यह अंक पहले के समय में शून्य की पहचान को बताता था।
'फाइडिंग जीरो' डॉ आमिर एक्जेल की शून्य को तलाश करने की जद्दोजहद मायावी कहानी सी लगती है। डॉ एक्जेल खुद बताते हैं कि कि यह शून्य ही है जो हमारी स्थान-मूल्य प्रणाली को संभव बनाता है। इसके बिना 48, 480, 4080 के बीच क्या अंतर है, इस बात का पता नहीं लगाया जा सकता है। बिना जीरो के अंकगणित के सवालों को हल नहीं किया जा सकता है। वहीं इसका प्रयोग सबसे ज्यादा आधुनिक कंप्यूटर सिस्टम की बाइनरी भाषा में होता है।
जीरो की उत्पत्ति कहां पर हुई है?
आज भी अगर हम बिना जीरो के अपने जिदंगी के बारे में सोचें तो हम सोच नहीं सकते हैं। यूरोपीय देशों में 13वीं सदीं तक जीरो के बारे में कोई कल्पना तक नहीं की गई थी, वे इस अंक को भारतीय और अरबी अंक प्रणाली से जुड़ा हुआ बताते थे। डॉ. एक्जेल इस बात के पीछे लगे हुए थे कि कैसे यह पता किया जाए कि यह जीरो की उत्पत्ति कहां पर हुई है।
तिथि निर्धारण करने के बाद यह पता चला कि यह खजुराहो के मैजिक स्क्वायर में जिस शून्य की बात की गई है वह दुनिया का सबसे पुराना जीरो नहीं है। बाद में पता चला कि इसको ग्वालियर शहर में ढूंढा जा सकता है, जहां पर एक मंदिर में इससे जुड़े 876 रिकॉर्ड मौजूद हैं।
पर डॉ. एक्जेल इससे भी पुराने शून्य की तलाश रहे हैं। माना जाता है कि ग्वालियर का शून्य, अरब के खलीफा के समकालीन है। यह भी कहा जाता है कि शून्य अरब व्यापारियों के जरिए पश्चिम से होता हुआ भारत पहुंचा है।
20वीं सदी में इस तरह के दावों को कई स्कॉलर ने उठाया। पर डॉ एक्जेल ने इस दावे को मात्र यूरोपीय कट्टरता समझा। इस बात में कोई संदेह नहीं था कि उन्होंने जीरो के अविष्कार को 'द ईस्टर्न माइंड' भी कहा।
गणित और सेक्स को एक साथ लाकर खड़ा कर दिया
डॉ. एक्जेल के मुताबिक पश्चिमी देशों के लोग मुख्य रूप से वाणिज्य और उपयोगवादी मामलों के लिए अंकों का प्रयोग करते थे। उन्होंने किताब में लिखा है कि शून्य सिर्फ एक उपयोगी प्रतीक नहीं है। यह कुछ न होने और अनुपस्थिति का प्रतीक भी है। यह थोड़ा आश्चर्यजनक है कि व्यवहारिक कहे जाने यूरोप के लोग भी उस समय इसे समझ नहीं सके।
डॉ. एक्जेल ने एक कदम आगे बढ़ते हुए एक आश्चर्यजनक तुलना कर डाली। उन्होंने इस तुलना में गणित और सेक्स को एक साथ लाकर खड़ा कर दिया। बौद्घ ध्यान में सकारात्मक खालीपन को शून्यता कहा गया है। और हिंदी में इसे शून्य कहा गया।
डॉ.एक्जेल का शून्य और पूर्वी देशों की सोच को लेकर जोड़ा गया कनेक्शन प्रभावशाली है। पर पूर्व और पश्चिम के बीच को लेकर उनका रुख पश्चिम की तरफ थोड़ा लचीला मालूम पड़ता है। पश्चिम के देशों में अंकों का रहस्यमयी प्रयोग नहीं किया जाता था।
इसके विपरीत, ग्वालियर की तारीखों और माप की गई रिकॉर्डिंग से पता चलता है प्राचीन भारत में भी लोग अंकों का प्रयोग वैसे ही करते थे जैसे यूरोपीय लोग करते थे। विचारों को कई तरह से प्रसारित करने के साथ उसकी व्याख्या भी अलग ढंग से की जाती थी। यह भी कहा जा सकता है कि शुद्घ शून्य की खोज में एक अहम कारण कहीं खो गया।
'फाइंडिंग जीरो' एक मनोरंजक कहानी
'फाइंडिंग जीरो' एक मनोरंजक कहानी हो सकती है। यह कोई बौद्घिक खोज नहीं है बल्कि एक व्यक्तिगत खोज है। इसलिए शायद डॉ. एक्जेल को अंकों को लेकर बचपन से जिज्ञासा रही है।
डॉ. एक्जेल ने फ्रेंच आर्कियोलॉजिस्ट जार्ज कोइड्स से काफी कुछ सीखा। जार्ज कोइड्स ने 683 ईसा पूर्व से 605 ईसा पूर्व के बीच कंबोडिया के मंदिर के खंडहर शिलालेख का अनुवाद किया था। यह एक सराहनीय प्रयास था। पर इसके कुछ तथ्यों को नष्ट भी कर दिया गया था। जिसकी खोज के लिए बाद में डॉ. एक्जेल बाहर ने अपना काम शुरू किया था। इसके लिए उन्होंने थाइलैंड, कंबोडिया, लाओस और वियतनाम तक सुराग ढूंढने की कोशिश की।
इस बुक के क्लाइमेटिक दृश्य में बताया गया है कि कैसे और कहां पर डॉ. एक्जेल ने कितनी मेहनत और घंटों तक भटकने के बाद एक ऐसे शिलालेख के पास पहुंचते हैं, जहां एक शिलालेख के साथ एक बड़ा पत्थर आता है। यहीं वह शून्य है जो कहीं खो गया था। माना जाता है कि करीब एक सदी से यह खोया हुआ था।
डॉ एक्जेल की शून्य को खोजने की यात्रा काफी रोचक है। पर इस पर कही सवाल उठते हैं। उनकी कहानी संख्याओं को लेकर उनके जुनून को बताने के साथ-साथ कई आश्चर्य भी पैदा कर देती है। न्यूयॉर्क टाइम्स ने इस पर सवाल उठाए कि जो किताब में लिखा है वह अंतिम सत्य नहीं है। कहानी थोड़ी संदिग्ध लगती है।