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अप्रैल का चुनावी पोलः BJP की बल्ले-बल्ले, AAP का हाल बेहाल

Tue, 15 Apr 2014 02:48 PM IST
टीम डिजिटल/अमर उजाला, नई दिल्ली
टीम डिजिटल/अमर उजाला, नई दिल्ली Updated Tue, 15 Apr 2014 02:48 PM IST
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opinion poll gives nda full majority, congress and aap downfall

2014 लोकसभा चुनावों में पहली बार एक ओपिनियन पोल ने सोमवार को पहली बार किसी चुनाव पूर्व गठबंधन को स्पष्ट बहुमत दे दिया। एक समाचार चैनल और एजेंसी ने मिलकर कराए इस पोल में 543 सीटों वाली लोकसभा में एनडीए को 275 सीट मिलने की उम्मीद जताई गई है।

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पिछले महीने इसी पोल की तुलना में यह 16 सीट ज्यादा है। पोल के मुताबिक भाजपा अपने दम पर 226 सीटें जीत सकती है। अगर ऐसा वाकई हुआ, तो यह साल 1991 के बाद किसी भी एक दल का इतनी सीट जीतने का यह पहला मामला होगा।
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पोल में संभावना जताई गई है कि यूपीए केवल 111 सीट जीतने में कामयाब रहेगी और इनमें से कांग्रेस के खाते में केवल 92 सीट जाएंगी। एनडीए की इस जीत का आधार उत्तर प्रदेश, महाराष्ट्र, राजस्थान, बिहार, आंध्र प्रदेश और मध्य प्रदेश बनने की बात कही गई है, जहां 2009 चुनावों की तुलना में उसे क्रमशः 41, 17, 17, 12 और 12 सीटों का फायदा हो सकता है।
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छह राज्यों में भाजपा को 109 सीट?

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इस लिहाज से देखें, तो इन छह राज्यों में उसे 109 सीट मिलेंगी। दूसरे राज्यों में भी एनडीए को फायदा होने की उम्मीद है, हालांकि सीटों के मोर्चे पर यह तादाद इतनी नहीं होगी।

एनडीटीवी के पोल के मुताबिक जिन बड़े राज्यों में एनडीए को पांच साल पहले की तुलना में कुछ नुकसान उठाना पड़ सकता है, उनमें कर्नाटक, छत्तीसगढ़ और पश्चिम बंगाल है, जहां उसे क्रमशः सात, दो और दो सीट का घाटा हो सकता है।

इसके उलट यूपीए को 2009 की तुलना में लगभग हर बड़े राज्य में नुकसान देखना होगा। इनमें आंध्र प्रदेश का नंबर सबसे पहले आएगा। कांग्रेस को पांच साल पहले यहां से 33 सीट मिली थीं, लेकिन इस बार केवल छह मिलने की संभावना है।

तृणमूल कांग्रेस तीसरा सबसे बड़ा दल?

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कर्नाटक और छत्तीसगढ़ को छोड़कर यूपीए को असम में दो सीट और बिहार में छह सीट का फायदा होने की उम्मीद है। इसकी वजह उसका लालू यादव की पार्टी आरजेडी से गठबंधन है, जो पांच साल पहले हुए चुनावों में नहीं था।

भाजपा और कांग्रेस के बाद ममता बनर्जी की तृणमूल कांग्रेस 30 सीटें जीतकर तीसरी सबसे बड़ी पार्टी बन सकती है। इसके अलावा एआईडीएमके को 22, समाजवादी पार्टी को 14, बीजेडी को 13, डीएमके को अपने सहयोगियों के साथ 14 और वाम दलों को 22 सीटें मिल सकती हैं।

यह पोल अरविंद केजरीवाल के लिए निराशा लेकर आया है, क्योंकि दिल्ली विधानसभा चुनावों में धमाकेदार प्रदर्शन करने वाली आम आदमी पार्टी को इस पोल में केवल 1 सीट दी गई है।

केजरीवाल को दिल्ली से बाहर कुछ नहीं?

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जिन राज्यों से जानकारी उपलब्‍ध है, उनमें दिल्ली को छोड़कर दूसरे किसी राज्य में केजरीवाल को कोई सीट मिलती नहीं दिख रही। इनमें वो सभी राज्य शामिल हैं, जहां सात या इससे ज्यादा सीट हैं।

हालांकि, दिल्ली में आम आदमी पार्टी और भाजपा के बीच सीधी ‌टक्कर बताई जा रही थी और कांग्रेस के मुकाबले से बाहर होने की बात कही जा रही थी। लेकिन इस पोल की संभावना कई सवाल खड़ा करती है।

हालांकि, अगर इस पोल की संभावनाओं के हकीकत हाती हैं, तो इनमें से किसी राजनीतिक दल की कोई अहमियत नहीं रह जाएगी, क्योंकि एनडीए को सरकार बनाने और मोदी को पीएम की कुर्सी तक पहुंचाने के लिए किसी नए दल के समर्थन की जरूरत नहीं होगी। हालांक‌ि, पोल गलत भी साबित होते रहे हैं।

यूपी में भाजपा का बढ़िया प्रदर्शन?

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पोल पर यकीन करें, तो उत्तर प्रदेश में भाजपा का प्रदर्शन बढ़िया रहेगा। वो सूबे की 80 लोकसभा सीट में से 50 से ज्यादा पर अपना नाम लिखने में कामयाब रह सकती है।

पार्टी को 51 सीट मिलने की उम्मीद जताई गई, जो पांच साल पहले की तुलना में 41 सीट ज्यादा है। भाजपा के पीएम पद के दावेदार नरेंद्र मोदी और पार्टी अध्यक्ष राजनाथ सिंह उत्तर प्रदेश से ही चुनाव लड़ रहे हैं।

पोल के मुताबिक कांग्रेस को केवल 5 सीट मिलेंगी, जो 2009 की तुलना में 16 कम है। मुलायम सिंह यादव की सपा को भी नुकसान होगा, जो इस बार 14 सीट तक पहुंच सकती है। पिछले चुनावों में उसे 23 सीट मिली थीं। मायावती की बसपा 20 से 10 सीट पर सिमट सकती है।

केजरीवाल का क्या होगा?

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दिल्ली विधानसभा चुनावों में आम आदमी पार्टी के बड़ी सियासी ताकत बनकर उभरने के बाद लग रहा था कि लोकसभा चुनावों में इसका असर देखने को मिलेगा। लेकिन पोल के मुताबिक ऐसा नहीं है।

एनडीटीवी-हंसा रिसर्च पोल में दिल्ली में भाजपा को छह और आम आदमी पार्टी को केवल एक सीट दी गई है। हैरानी की बात यह है कि सात में से एक भी सीट कांग्रेस के खाते में नहीं दी गई है।

अगर ऐसा हुआ, तो यह केजरीवाल के लिए तगड़ा झटका होगा, जो दिल्ली में अपनी जमीन बचाने की कोशिश कर रहे हैं। हालांकि, दिल्ली सरकार से इस्तीफा देने के बाद उन्हें कई सवालों का जवाब देना पड़ रहा है।

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