भाजपा के इन छिपे रुस्तमों पर किस्मत मेहरबान
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भाजपा की सीनियर ब्रिगेड में शामिल किए जा चुके मुरली मनोहर जोशी को शायद खुद इस बात की आशंका थी कि वो कानपुर से नहीं जीत पाएंगे।
यहां तक कि जोशी ने अपनी पुरानी सीट पाने के लिए कई बार रूठने का इशारा भी किया लेकिन भाजपा ने उन्हें चुका हुआ समझ कर उन पर बड़ा दांव नहीं खेला। लेकिन जोसी किस्मत के धनी निकले और सीट निकाल ले गए।
गांधीनगर: लाल कृष्ण आडवाणी
लाल कृष्ण आडवाणी के बारे में बात की जाए स्पष्ट हो रहा है कि वो खुद गांधीनगर से लड़ना नहीं चाह रहे थे। जानकार कहते हैं कि खुद आडवाणी को इस बात का अंदेशा था कि कहीं मोदी साजिश के तहत आडवाणी को हरवा न दें।
लेकिन हर किसी का अंदेशा गलत निकला और भाजपा का ये सीनियर खिलाड़ी बाजी मार ले गया।
नागपुर: नितिन गडकरी
पहली बार चुनाव लड़ रहे नितिन गडगरी को नागपुर की सीट दी गई। इस सीट से कांग्रेस के विलास मत्तेवार लगातार पांच बार सांसद रहे हैं। ऐसे में प्रचार के मैदान में नए नितिन गडगरी को काफी दिक्कतों का सामना करने का अंदेशा था।
माना जा रहा था कि अगर नितिन हारते भी हैं तो भी महाराष्ट्र में कांग्रेस के इस अभेद गढ़ समझने में आसानी होगी। लेकिन इसे मोदी लहर कहिए या नितिन गडगरी की क्षमता, ये सीट भाजपा के खाते में आ गई।
बागपत: सत्यपाल सिंह
मुंबई के पूर्व पुलिस कमिश्नर सत्यपाल सिंह भाजपा के छिपे रुस्तम निकले। बागपत जैसे जाट बहुल क्षेत्र में चौधरी अजित सिंह को पटखनी देना वाकई अचंभित करने वाला है।
भाजपा ने एक ईमानदार कहे जाने वाले पुलिस अधिकारी को जाट नेता के खिलाफ उतारा तो उसे उम्मीद नहीं थी कि ये पुलिस वाला जाट वोट खींच पाएगा।
खासकर तब जब कुछ ही समय पहले जाट आरक्षण लागू हुआ हो। लेकिन सत्यपाल सिंह ने अजित सिंह जैसे ताकतवर नेता को धूल चटा कर साबित कर दिया कि किस्मत और मतदाता कुछ भी कर सकते हैं।
किरण खेर चंडीगढ़ से
चंडीगढ़ से जब भाजपा ने अभिनेत्री किरण खेर को मैदान में उतारा तो हर किसी का सवाल था, कांग्रेस के पवन बंसल जैसे तगड़े उम्मीदवार के सामने नौसिखिया किरण खेर ही क्यों। दरअसल भाजपा इस सीट पर जीत को लेकर आश्वस्त भी नहीं थी।
किरण का राजनीति से कभी पाला नहीं पड़ा और वो भी जानती थी कि केवल पंजाबी होने से ही उनके खाते में वोट नहीं पड़ने वाले। एक तरफ पवन बंसल की पुरानी सीट और दूसरी तरफ आप की तरफ से गुल पनाग का ग्लैमर।
किरण खैर को भी जीतने की उम्मीद कम ही थी लेकिन चंडीगढ़ की जनता ने भाजपा को यह सीट गिफ्ट में दे दी।
चांदनी चौक: डॉ. हर्षवर्धन
दिल्ली में भाजपा के प्रदेश अध्यक्ष डा, हर्षवर्धन सिंह के चांदनी चौक से जीतने की संभावनाएं काफी गम थी। माना जा रहा है कि पिछली बार के सांसद कपिल सिब्बल का मुख्य मुकाबला आप के आशुतोष से हैं।
खुद भाजपा को ये अंदाजा था कि संगठन के व्यक्ति होने के कारण हर्षवर्धन का जनाधार उतना नहीं हो पाएगा। लेकिन हर्षवर्धन पक्के खिलाड़ी निकले और उन्होंने तीन बार के सांसद कपिल सिब्बल को चांदनी चौक की गलियों में धूल चटा दी।
देवरिया: कलराज मिश्र
भाजपा के इस बुढ़ा चुके नेता की कभी प्रदेश और संगठन में तूती बोलती थी। लेकिन उम्र के फेर में कलराज मिश्र को हाशिए पर ला खड़ा कर दिया।
जोशी और आडवाणी की तरह भाजपा ने कलराज मिश्र पर भी बड़ा दांव नहीं खेला और उन्हें उनके हाल पर छोड़ दिया। यही कलराज मिश्र देवरिया में बसपा के नियाज अहमद से ढाई लाख रिकार्ड वोटों से जीत गए।
मथुर: हेमा मालिनी
भाजपा को हार का डर मथुरा की सीट पर भी था। यहां से ड्रीम गर्ल हेमा मालिनी को उतारा गया। लेकिन मथुरा का इतिहास कहता है कि यहां से कभी कोई महिला उम्मीदवार नहीं जीती।
यहां हेमा मालिनी के खिलाफ रालोद के युवा नेता जयंत चौधरी ताल ठोक रहे थे। खुद संघ को अंदेशा था कि मथुरा बाहर से आई हेमा को स्वीकार नहीं करेगी और इसीलिए उसने अपनी पूरी मशीनरा हेमा के लिए झोंक दी।
लेकिन हेमा की किस्मत कहिए कि वो जयंत चौधरी जैसे लोकप्रिय जाट नेता को परास्त कर संसद जा पहुंची।
डुमरिया गंज: जगदंबिका पाल
ऐन चुनाव से पहले कांग्रेस छ़ोड़कर आए जगदंबिका पाल के भी हारने की आशंका लग रही थी। खुद भाजपा को अंदेशा था कि शायद जनता दलबदलू समझ कर जगदंबिका पाल को ठुकरा न दे।
लेकिन जगदंबिका पाल की किस्मत के बारे में क्या कहें कि पार्टी बदलने के बावजूद जनता ने उन्हें सिर आंखों पर बिठाया।
पाटलिपुत्र: रामकृपाल यादव
रामकृपाल यादव लालू ने जब रामकृपाल यादव की पाटलिपुत्र सीट छीनकर अपनी बेटी मीसा भारती को दे दी तो खफा होकर रामकृपाल यादव ने भाजपा का दामन पकड़ लिया।
राजनीतिक विशलेक्षक उम्मीद कर रहे थे कि लालू जोड़ तोड़ और प्रचार के बल पर बेटी की सीट निकाल ले जाएंगे। ल