1 साल 30 देश, क्या खोया, क्या पाया पीएम मोदी ने?
प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने अपने एक साल के कार्यकाल में बाहरी दुनिया के साथ रिश्तों को लेकर खूब चर्चा बटोरी है। सरकार के विदेश मंत्रालय की मुखिया भले ही भाजपा की वरिष्ठ नेता सुषमा स्वराज हों, लेकिन इस दौरान बाहरी दुनिया के हर मंच पर मोदी ही छाए रहे। पीएम मोदी ने इस दौरान 16 विदेश यात्राओं में 30 देशों का भ्रमण किया।
पड़ोसियों के साथ-साथ दुनिया के देशों और ब्रिक्स, सार्क व जी-20 जैसे अंतरराष्ट्रीय मंचों पर खुद मोदी ने दमदार तरीके से भारत का प्रतिनिधित्व किया। शपथ ग्रहण समारोह में सार्क देशों के शासनाध्यक्षों को बुलाने के साथ गणतंत्र दिवस परेड में अमेरिकी राष्ट्रपति की मेजबानी करने और बीते दिनों फ्रांस की यात्रा के दौरान 36 राफेल लड़ाकू विमानों की खरीद की घोषणा कर मोदी ने यह बता दिया कि उनकी सरकार की विदेश नीति ढर्रे से अलग है।
मोदी ने अपनी पहली विदेश यात्रा के लिए पड़ोसी देश भूटान को चुना, तो कार्यभार संभालने के कुछ ही समय बाद चीनी राष्ट्रपति शी जिनपिंग की अहमदाबाद में मेजबानी की। इस दौरान अमेरिका और ऑस्ट्रेलिया की यात्रा के दौरान मोदी ने खूब चर्चा भी बटोरी। लेकिन, इस चकाचौंध के बीच कूटनीति के जानकार उनके एक साल के कार्यकाल की समीक्षा भी कर रहे हैं। मोदी की विदेशी यात्राओं का मकसद भारत में अधिक से अधिक विदेशी निवेश लाना रहा है।
भारत के प्रति चीन का रवैया अब भी आक्रामक
चीनी राष्ट्रपति ने अपनी यात्रा के दौरान देश में 20 अरब डॉलर के निवेश की बात कही थी, वहीं मोदी की टोक्यो यात्रा के दौरान जापान ने विभिन्न परियोजनाओं के लिए 35 अरब डॉलर देने की बात कही। जानकारों का कहना है कि मोदी की कोशिश के बावजूद भारत के प्रति चीन का रवैया अब भी आक्रामक है।
चीन के आर्थिक विकास से काफी प्रभावित होकर गुजरात के मुख्यमंत्री रहते हुए मोदी ने वहां की पांच बार यात्रा की थी। लेकिन, कुल मिलाकर भारत और चीन का संबंध सपाट नहीं है।
इस महीने चीन की यात्रा पर जा रहे मोदी को भारी व्यापार असंतुलन और सीमा विवाद जैसे जटिल मुद्दों से निपटना होगा। इस बीच चीनी राष्ट्रपति ने पाकिस्तान की यात्रा की। उन्होंने अपनी यात्रा को ‘भाई के घर जाना’ करार दिया और पाक में 46 अरब डॉलर के निवेश की बात कही, जो भारत के प्रति चीन की प्रतिबद्धता पर सवाल उठाता है।
जापानी निवेश का रास्ता सुगम नहीं हो पाया
जहां तक जापान के साथ संबंधों की बात है तो यह सही है कि मोदी की जापानी पीएम शिंजो अबे के साथ अच्छी मित्रता है, लेकिन उनकी तमाम कोशिशों के बावजूद देश में जापानी निवेश का रास्ता सुगम नहीं हो पाया है।
पिछले माह मोदी-शिंजो वार्ता में बनी सहमति की जमीनी हकीकत जानने आए जापान के व्यापार, अर्थव्यवस्था और उद्योग मामलों के मंत्री योइची मियाजावा ने स्पष्ट कर दिया कि अभी तक उनके देश की चिंताओं को दूर नहीं किया गया है।
इन तमाम हाइप्रोफाइल दौरों पर नजर रखने वाले एक वरिष्ठ राजनयिक का कहना है कि अब मोदी को यह समझ लेना चाहिए कि केवल विदेशी दौरों से विदेशी निवेश हासिल नहीं किए जा सकते, बल्कि इसके लिए जमीन पर कार्रवाई की जरूरत है।
उन्होंने मोदी की ओर से आगे बढ़कर कदम उठाने का स्वागत किया, लेकिन साथ ही कहा कि विदेश नीति राष्ट्रीय हित को ध्यान में रखते हुए माप तौलकर कदम उठाने का विषय है।
'मोदी सरकार पाकिस्तान को लेकर भ्रम में'
नरेंद्र मोदी कहते हैं कि अहमदाबाद में एक कहावत चलन में है। सिंगल फेयर, डबल जर्नी। इसलिए मैं एक विदेश दौरे में दो-तीन देशों की यात्रा कर लेता हूं।
अरुण शौरी ने मोदी को लेकर कहा कि मोदी सरकार पाकिस्तान को लेकर भ्रम में है। हर प्रधानमंत्री की तरह मोदी को लगता है कि वह पाक के साथ लीक से हट कर कोई समझौता कर लेंगे। लेकिन यह संभव नहीं है।
आसान नहीं चुनौती
मोदी की विदेशी यात्राओं का मकसद भारत में अधिक से अधिक विदेशी निवेश लाना था। लेकिन उन्हें यह समझ लेना चाहिए कि केवल विदेशी दौरों से विदेशी निवेश हासिल नहीं किए जा सकते, बल्कि इसके लिए जमीन पर कार्रवाई की जरूरत है। - एक वरिष्ठ राजनयिक की टिप्पणी