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बीजेपी के चहेते स्वामी वाजपेयी को थे नापसंद

Sat, 19 Dec 2015 04:18 PM IST
राधिका रामाशेषन/वरिष्ठ पत्रकार
राधिका रामाशेषन/वरिष्ठ पत्रकार Updated Sat, 19 Dec 2015 04:18 PM IST
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Once disliked by Atal now Swamy turns Modi Confident

आज की नरेंद्र मोदी सरकार डॉक्टर सुब्रमण्यम स्वामी के निर्णायक कदमों को ही आगे बढ़ाते हुए लुटियंस दिल्ली की सत्ता का हिस्सा बनी है। बंद हो चुके अखबार 'नेशनल हेरल्ड' में धोखाधड़ी के मामले में सोनिया गांधी और राहुल गांधी के निचली अदालत में पेश होने के घंटों पहले ही इस मामले के मुख्य शिकायतकर्ता और गांधी परिवार की ताजा मुश्किलें बढ़ाने वाले सुब्रमण्यम स्वामी को राष्ट्रीय राजधानी के सबसे बेशकीमती इलाके लुटियंस जोन में बंगला अलॉट किया गया है।

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सरकारी सूत्रों ने गृह मंत्रालय के ताजा आकलन के हवाले से बताया है कि सुब्रमण्यम स्वामी पर बढ़ते खतरे को देखते हुए उन्हें ये बंगला दिया गया है। स्वामी अब तक एक निजी घर में रहते थे जिसमें जेड श्रेणी की सुरक्षा वाले राजनेता की सुरक्षा में तैनात पुलिसकर्मियों के ठहरने लायक जगह नहीं थी। लेकिन स्वामी खुद को सिर्फ एक राजनेता नहीं मानते हैं।
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वो खुद को वंशवादी राजनीति (यहां नेहरू गांधी परिवार पढ़ा जाए) को खत्म करने और प्रणालीगत सत्यनिष्ठा और न्याय के लिए लड़ने वाला योद्धा कहलाना ज्यादा पसंद करेंगे। सवाल ये है कि स्वामी भारतीय जनता पार्टी की राजनीति में कहां फिट बैठते हैं?
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उतार-चढ़ाव वाला रहा बीजेपी से रिश्ता

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स्वामी का भारतीय जनता पार्टी के साथ रिश्ता उतार-चढ़ाव वाला रहा है। पार्टी के पहले प्रधानमंत्री अटल बिहारी वाजपेयी ने स्वामी के प्रति अपनी नापसंदी को कभी नहीं छुपाया। स्वामी ने 1998 में जयललिता की एआईडीएमके के सहयोग वाले एनडीए गठबंधन की सरकार को खतरे में ही डाल दिया था।

जयललिता इस गठबंधन की बेहद अहम सहयोगी थीं और वो सुब्रमण्यम स्वामी को वित्तमंत्री बनाने पर अड़ गईं थीं। यहां तक की गठबंधन छोड़ने की धमकी तक दे डाली थी। वाजपेयी समीकरणों की मुश्किलें भांप गए थे। हालांकि स्वामी हार्वर्ड विश्वविद्यालय के अर्थशास्त्री हैं, लेकिन वाजपेयी राजनीतिक परिणामों की चिंता किए बिना नए ढांचागत सुधार लागू करने के अपने एजेंडे में उनके फिट होने को लेकर संशय में थे।

स्वामी के अर्थशास्त्र पर उनकी अपनी सामाजिक भलमनसाहत का रंग चढ़ा था। वे विदेशी बैंकों में रखे गए काले धन को वापस लाने के अपने विचार में भी फंसे थे। उनकी सुधारों की संकल्पना का आधार 'स्वदेशी' था जो वाजपेयी और उनके आर्थिक सलाहकारों के लिए अभिशाप जैसी स्थिति थी। इसलिए स्वामी वित्त मंत्री का पद हासिल नहीं कर पाए। लेकिन उन्होंने वाजपेयी के लिए मुश्किले खड़ी कर दीं।

जयललिता और उस वक्त राजनीतिक शुरुआत करने वाली सोनिया गांधी में उन्हें ऐसे दो भरोसेमंद सहयोगी दिखे जो वाजपेयी की सरकार गिराने की उनकी योजना को आगे बढ़ाने और लागू करने में अहम भूमिका निभा सकते थे। जब तक भाजपा पर अटल बिहारी बाजपेयी की पकड़ रही स्वामी पार्टी में अपने पैर नहीं जमा पाए। लेकिन आरएसएस और विश्व हिंदू परिषद में ऐसे कुछ लोग थे जो इस पूर्व अर्थशास्त्री के लिए जगह रखते थे। वे स्वामी में सहज बुद्धि, पांडित्य, छल का आदर्श मिश्रण देखते थे।

लाल कृष्ण आडवाणी हमेशा से स्वामी को पार्टी में वापस चाहते थे। चेन्नई के चार्टर्ड अकाउंटेंट एस गुरुमूर्ती और संघ के विचारक और पूर्व राज्यसभा सांसद बलबीर पुंज भी इनके समर्थन में थे।

मोदी को स्वामी में नजर आया सहयोगी

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वाजपेयी और आडवाणी के बाद के युग के नेताओं में कुछ ही स्वामी को पसंद करते थे और उन्हें विद्रोही स्वभाव का समझते थे। लेकिन मोदी इसके अपवाद थे।

कांग्रेस और गांधी परिवार को कमजोर करने का उत्साह जो 'कांग्रेस मुक्त' नारे में बदल गया से लबरेज मोदी को स्वामी में अपने एजेंडा आगे बढ़ाने वाला सहयोगी दिखा। 2014 के चुनावों से ठीक पहले मोदी स्वामी को वापस पार्टी में ले आए।स्वामी पहले भी सोनिया गांधी पर पुरातत्व की चीजों की तस्करी का मामला दर्ज करा चुके हैं।

वे उनकी शैक्षणिक योग्यता को भी चुनौती दे चुके हैं। अब स्वामी फिर से काम पर लग चुके थे और उन्हें हरी झंडी भी मिल चुकी थी। ऐसे में संसद के मौजूदा शीत सत्र से पहले स्वामी ने बीजेपी के संसदीय रणनीतिकारों के विधायी कार्य को आगे बढ़ाने के लिए कांग्रेस का सहयोग हासिल करने की योजना में पलीता लगा दिया।

वे अदालत गए और राहुल की कथित दोहरी नागरिकता के मामले में सुनवाई की मांग की। ये मंसूबा नाकाम हो गया लेकिन कांग्रेस को भाजपा के सामान्य रिश्ते रखने के इरादों पर संदेह हो गया।

'बोफोर्स जैसा है हेरल्ड केस'

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'नेशनल हेरल्ड' मामला सरकार की ताबूत में आखिरी कील साबित हुआ। स्वामी ने गांधी परिवार के खिलाफ अपनी शिकायत को आगे बढ़ाया और सरकार का जीएसटी और अन्य विधेयक पास करने की कोशिशें हवा हो गईं। हालांकि मजे की बात ये है कि मोदी ने स्वामी के इरादों का समर्थन किया है।

हेरल्ड मामले को प्रतीक बनाकर अपने 'भ्रष्टाचार मुक्त भारत' के एजेंडे में फिर से जान फूंकने के लिए समूची भारतीय जनता पार्टी कांग्रेस पर आक्रामक हो गई। भाजपा ने इसे हाल के दिनों का बोफोर्स जैसा मामला बना लिया है। दरअसल, स्वामी एक अप्रत्याशित शख्स हैं। भाजपा सांसद कीर्ति आजाद के वित्त मंत्री अरुण जेटली पर दिल्ली और डिस्ट्रिक्ट क्रिकेट एसोसिएशन (डीडीसीए) का 2013 तक अध्यक्ष रहते कथित भ्रष्टाचार के आरोपों से तिलमिलाई भाजपा ने स्वामी की प्रतिक्रिया का इंतजार किया।

भाजपा को राहत देते हुए स्वामी ने कहा कि कीर्ति आजाद के आरोपों से जेटली के भाजपा का वरिष्ठ नेता और मंत्री होने से कोई संबंध नहीं है क्योंकि ये एक ऐसे पद से जुड़े हैं जिस पर वो अपनी निजी हैसियत से थे। स्वामी ने एक बार 'सही तरीके' से काला धन वापस न लाने के मुद्दे पर अरुण जेटली की आलोचना की थी। लगता है अब स्वामी मन और विचार से बदल गए हैं।

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