राजे और जसवंत की भिड़ंत से कांग्रेस की गोटी लाल
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राजस्थान में बाड़मेर सीट से भाजपा के वरिष्ठ नेता जसवंत सिंह और भाजपा की लड़ाई में तीसरे यानी कांग्रेस को खुद का फायदा नजर आ रहा है। कांग्रेस का मानना है कि जसवंत सिंह भाजपा के ही वोट काटेंगे।
कांग्रेस ने इस बार अपने वर्तमान सांसद हरीश चौधरी को ही मौका दिया है। अब मामला इतना उलझ गया है कि सभी की नजरें मारवाड़ क्षेत्र की इस सीट पर लगी हुई हैं।
गौरतलब है कि बाड़मेर में पिछले विधानसभा चुनाव में करीब 80 प्रतिशत मतदान हुआ था। यहां की आठ में से सात विधानसभा सीटें भाजपा के खाते में हैं।
प्रतिष्ठा की लड़ाई बाड़मेर सीट
भाजपा के वरिष्ठ नेता जसवंत सिंह ने बाड़मेर सीट से निर्दलीय पर्चा भरकर राजस्थान की इस सीट पर होनेवाले चुनाव को सबसे रोचक बना दिया है। अब यहां भाजपा और जसवंत सिंह की नहीं, बल्कि जसवंत सिंह और मुख्यमंत्री वसुंधरा राजे के बीच प्रतिष्ठा की लड़ाई होगी।
राजे ने ही कांग्रेस छोड़ भाजपा में शामिल हुए जाट समाज के कर्नल सोनाराम को भाजपा से टिकट दिलवाया है। इस सीट से कांग्रेस के टिकट पर कर्नल सोनाराम तीन बार सांसद रहे हैं। इस सीट पर सर्वाधिक जाट मतदाता हैं, लेकिन राजपूत, अल्पसंख्यक तथा दलित मतदाता भी परिणाम पलटने की हैसियत रखते हैं।
कांग्रेस ने यहां के वर्तमान सांसद हरीश चौधरी को ही टिकट दिया है। अब मामला इतना उलझ गया है कि सभी की नजरें मारवाड़ क्षेत्र की इस सीट पर लगी हुई हैं।
इतिहास कांग्रेस के पक्ष में
आजादी के बाद से यदि बाड़मेर सीट का विश्लेषण किया जाए तो यहां अधिकतर कांग्रेस भारी रही है। बाड़मेर सीट पर 14 लोकसभा चुनावों में से 9 बार कांग्रेस जीती है और भाजपा का खाता केवल एक बार ही खुला है।
वर्ष 2004 में भाजपा के टिकट पर जसवंत सिंह के पुत्र मानवेंद्र सिंह ने कांग्रेस प्रत्याशी कर्नल सोनाराम को हराया था। इससे पूर्व वर्ष 1996 से लेकर 2004 तक कर्नल सोनाराम लगातार तीन बार लोकसभा चुनाव जीते।
इस सीट से सबसे अधिक बार सांसद रहने की उपलब्धि भी कर्नल सोनाराम के पास है।
समाज और सहानुभूति जसवंत के साथ
जसवंत सिंह को राजपूत समाज के साथ के अलावा सहानुभूति लहर का सहारा मिलने की उम्मीद है। यहां करीब 17 लाख मतदाताओं में से करीब 2.5 लाख राजपूत मतदाता हैं, जो मानते हैं कि भाजपा ने टिकट देने में राजपूत समाज का खयाल नहीं रखा।
इधर, कर्नल सोनाराम की नजरें करीब 3.5 लाख जाट मतदाताओं पर लगी हुई हैं, लेकिन कांग्रेस के हरीश चौधरी के भी इसी समाज से आने के कारण जाट मतदाता निश्चित रूप से बंटेंगे। यहां अल्पसंख्यक के भी करीब 2.5 तथा दलित समाज के करीब चार लाख मत हैं।
अल्पसंख्यक कांग्रेस का वोट बैंक माने जाते हैं। यदि जसवंत सिंह भाजपा के टिकट पर लड़ते, तो अल्पसंख्यक भले ही कांग्रेस चुनते, लेकिन अब सहानुभूति लहर चल गई है, तो अल्पसंख्यकों के पास जसवंत सिंह एक विकल्प बन सकते हैं। अब दलित एवं अन्य मतदाताओं का रूझान ही जीत की दिशा तय करेगा।
भाजपा की डगर होगी कठिन
जसवंत सिंह के खड़े होने से कांग्रेस को राहत मिली है, क्योंकि वे भाजपा के ही वोट काटेंगे, इससे भाजपा को नुकसान होगा। गौरतलब है कि बाड़मेर में पिछले विधानसभा चुनाव में करीब 80 प्रतिशत मतदान हुआ था।
यहां की आठ में से सात विधानसभा सीटें भाजपा के खाते में हैं। इससे पहले कर्नल सोनाराम बाड़मेर संसदीय क्षेत्र में ही आनेवाली बायतू सीट से कांग्रेस के टिकट पर चुनाव लड़ा था और भाजपा के कैलाश चौधरी से हार का स्वाद चखा था।
यहां की सात सीटों में से तीन पर राजपूत विधायक हैं और दो जाट विधायक हैं।
विधायक भी थे सिंह के साथ
सूत्रों ने बताया कि सोनाराम को जिताने के लिए वसुंधरा राजे ने कितने ही कड़े निर्देश दे दिए हों, लेकिन सभी विधायक चाहते थे कि जसवंत सिंह को टिकट मिले।
इस स्थिति में विधायक ऊपर से भले ही राजे के साथ दिखें, लेकिन सोनाराम को जिताने के लिए वे लगन से लगेंगे, इसमें शक है।
यह भी तर्क दिया जा रहा है कि बायतू विधानसभा सीट से भाजपा प्रत्याशी बनकर कांग्रेस प्रत्याशी कर्नल सोनाराम का विरोध करनेवाले कैलाश चौधरी अपने समर्थकों से अब कैसे कहेंगे कि भाजपा प्रत्याशी (कर्नल सोनाराम) को जिताओ?