फ्री ई-पेपर
पर्सनलाइज़्ड फ़ीड
पर्सनलाइज़्ड नोटिफ़िकेशन
चलते-फिरते ख़बरें
लॉयल्टी रिवॉर्ड्स
डाउनलोड करें

सब्सक्राइब करें
Hindi News ›   News Archives ›   India News Archives ›   omprakash valmiki_managerpandey_dalit sahitya

'बेहद सच्चा और साहसी था जूठन का लेखक'

Mon, 18 Nov 2013 08:11 AM IST
मैनेजर पांडेय
मैनेजर पांडेय Updated Mon, 18 Nov 2013 08:11 AM IST
विज्ञापन
omprakash valmiki_managerpandey_dalit sahitya

यह जानकर मुझे बहुत दुख हो रहा है कि ओमप्रकाश वाल्मीकि का अचानक निधन हो गया है। ये ख़बर तो थी कि वो थोड़े बीमार थे, लेकिन अभी उनकी कोई ऐसी आयु नहीं हुई थी कि उनकी मृत्यु की कोई आशंका करे। मुझे इसका बहुत गहरा दुख है।

विज्ञापन


जहां तक ओमप्रकाश वाल्मीकि के साहित्यिक कार्यों और उनके योगदान का सवाल है तो पहली बात ये कि ओमप्रकाश वाल्मीकि एक बहुत अच्छे कवि थे।

जो दलित लोग कविताएं लिख रहे हैं, उनमें मेरी दृष्टि में उन्हें सबसे अच्छे और बड़े कवि के रूप में माना जाना चाहिए और मैं व्यक्तिगत तौर पर ऐसा मानता हूं।
विज्ञापन


ओमप्रकाश वाल्मीकि कवि के साथ-साथ बहुत अच्छे कहानीकार भी थे। उनके कहानी संग्रह छपे हुए हैं और उनमें एक से एक मार्मिक और प्रभावशाली कहानियां हैं।

अनूठी आत्मकथा

तीसरा क्षेत्र था उनकी आत्मकथा, जिसका अंग्रेज़ी सहित अनेक भाषाओं में अनुवाद हुआ है और वो एक तरह से हिंदी में दलित आत्मकथा लेखन की राह बनाने वाले लेखक थे।
विज्ञापन
विज्ञापन


ओमप्रकाश वाल्मीकि की चर्चा मैं अपने भाषणों और लेखों में तब से करता आ रहा हूं जब वो इतने प्रसिद्ध नहीं थे।

'जूठन' दलित साहित्य की श्रेष्ठ रचनाओं में से है। दिल्ली में हंस की ओर से दलित साहित्य पर पहली गोष्ठी पिछली सदी के 90 के दशक में हुई थी। उसमें मैंने ओमप्रकाश वाल्मीकि की नवभारत टाइम्स में छपी एक कविता की विस्तार से चर्चा की थी और यह भी कहा कि मैं नहीं जानता कि ये ओमप्रकाश वाल्मीकि कौन हैं।

ओमप्रकाश वाल्मीकि उस गोष्ठी में बैठे हुए थे। मेरा उनसे कोई परिचय नहीं था तो राजेन्द्र यादव ने कहा कि ओमप्रकाश वाल्मीकि आपके सामने बैठे हुए हैं।

दलित सौंदर्य के सृजक
एक कवि, कहानीकार और आत्मकथा लेखक के रूप में मेरा उनसे संबंध था ही, मेरा उनसे व्यक्तिगत रूप से भी संबंध था।

उन्होंने दलित साहित्य से जुड़े आलोचनात्मक सवालों पर भी लिखा है और इस विषय पर उनकी किताब भी छपी हुई है।

इन दिनों दलित साहित्य के सौंदर्य शास्त्र की चर्चा चल रही है। उस चर्चा में मराठी के लेखकों को छोड़ दें तो हिंदी में इसकी शुरुआत करने वाले लोगों में ओमप्रकाश वाल्मीकि शामिल हैं।

इसलिए आगे आने वाले दिनों में उनकी रचनाशीलता का अधिक बेहतर मूल्यांकन होगा और उनके बारे में लोग लिखेंगे और बात करेंगे।

ओमप्रकाश वाल्मीकि की आत्मकथा 'जूठन' की तीन विशेषताओं की मैं चर्चा करना चाहूंगा। मैं पहले से ही कहता आया हूं कि ललित भाषा में दलित साहित्य नहीं लिखा जा सकता है क्योंकि दलित अपने जीवन में सदियों से जिस भाषा को सुनते और सहते चले आ रहे हैं, उसी भाषा में उनकी ज़िंदगी की हकीकत, उनकी ज़िंदगी की समस्याएं और उनकी ज़िंदगी की संवेदनाएं प्रामाणिक रूप से व्यक्त की जा सकती हैं।


सच्चे और साहसी इंसान
दलितों की आवाज़ को वाल्मीकि ने साहित्यिक मंचों पर मुखरता से उठाया।

वैसी भाषा, सच कहने का साहस और एक विशेष रचाव को विकसित करने की कोशिश उनकी आत्मकथा 'जूठन' में है।

इसीलिए जब वो आत्मकथा आई थी तो उसने लेखकों का ध्यान अपनी ओर खींचा।

असल में दलित साहित्य हिंदी में एक आंदोलन के रूप में थोड़ी देर से शुरू हुआ। मुख्य रूप से 1990 के बाद यह शुरू हुआ। उसमें जो प्रतिभाशाली लेखक थे, उनमें ओमप्रकाश वाल्मीकि सबसे आगे थे।

इन लेखकों की रचनाशीलता की गुणवत्ता के कारण वो मुख्यधारा के समांतर धारा के रूप में स्थापित हुआ और उसे स्वीकार भी किया गया।

एक व्यक्ति के रूप में ओमप्रकाश वाल्मीकि बहुत ही सहज, निर्भीक और साहस के साथ अपनी सोच-विचार का सच कहने वाले व्यक्ति थे।

उन्हें व्यक्तिगत रूप से मैंने जितना जाना-पहचाना, तो उनके व्यक्तित्व का बराबर मेरे ऊपर प्रभाव बना रहा है।

विज्ञापन
विज्ञापन
विज्ञापन
विज्ञापन
विज्ञापन

एड फ्री अनुभव के लिए अमर उजाला प्रीमियम सब्सक्राइब करें

Next Article

AU ऐप में पढ़ें

Followed