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आग से बचाई थीं आठ जिंदगियां, आज तक हरे हैं वो जख्म

Tue, 26 Jan 2016 06:15 AM IST
Updated Tue, 26 Jan 2016 06:15 AM IST
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omprakash saved eight lifes but now waiting to get good treatment

स्कूली वाहन में आग लगने के दौरान आठ मासूमों की जिंदगी बचाने में झुलस गए ओमप्रकाश को आज इलाज के लाले पड़े हैं। हर ओर से निराश होकर गणतंत्र दिवस की पूर्व संध्या पर सोमवार को वह सहयोगियों के साथ नगर में चंदा जुटाते नजर आया।

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2012 में गणतंत्र दिवस पर संजय बाल वीरता पुरस्कार में मिले एक लाख रुपये समेत तकरीबन आठ लाख रुपये खर्च कर पिता ने इलाज कराया लेकिन अब तक घाव भरे नहीं। जख्मी हिस्सों के इलाज के लिए उसे अभी सात लाख रुपये की जरूरत है।
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चार सितंबर, 2010 को बिलरियागंज थाना क्षेत्र के नसीरपुर के पास बच्चों से भरी मां यशोदा स्मारक इंटर कॉलेज की मारुति वैन में आग लग गई थी। आग लगने पर चालक बच्चों को छोड़कर भाग गया लेकिन उस समय बारह साल के कक्षा सात के छात्र ओमप्रकाश ने हिम्मत बांधी और एक-एक कर सभी आठ बच्चों को वैन से सुरक्षित निकाल लाया।
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इस दौरान हाथ सहित शरीर के हिस्से बुरी तरह से झुलस गए। गंभीर हालत में उसे आजमगढ़ में ही प्राइवेट अस्पताल में भर्ती कराया गया। इस बहादुरी पर 26 जनवरी, 2012 में उसे संजय बाल वीरता पुरस्कार के साथ ही कई अन्य पुरस्कारों से नवाजा गया।

इलाज के लिए खेत भी रख दिया गिरवी

omprakash saved eight lifes but now waiting to get good treatment

तमाम इलाज के बाद भी ओमप्रकाश के घाव अभी भी हरे ही हैं। पिता लालबहादुर कहते हैं कि पुरस्कार में मिले रुपये फूंकने के अलावा खेत भी बंधक रखकर इलाज कराया, मगर ओमप्रकाश के जख्म आज भी भरे नहीं।

रह-रहकर उनमें से मवाद निकलता रहता है। उसे प्लास्टिक सर्जरी के लिए लगभग सात लाख रुपयों की दरकार है। 2013 में मदद की आस लिए वह मुख्यमंत्री के दरबार पहुंचा, मगर सुरक्षा तंत्र के चलते उसकी मुलाकात नहीं हो सकी। जिला प्रशासन से फरियाद की, किसी ने नहीं सुनी।

इसी बीच उसकी मुलाकात जिले के प्रमुख समाजसेवी रामकुंवर यादव से हुई। रामकुंवर के साथ ओमप्रकाश ने सोमवार को इलाज के लिए नगर में चंदा जुटाया। ओमप्रकाश का कहना है कि वह हर ओर से निराश हो चुका है। अब चंदा जुटाने के अलावा और कोई रास्ता नहीं बचा है।

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