ओबामा यात्रा: क्या हम चाहते थे, क्या हमे मिला?
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अमेरिकी राष्ट्रपति बराक ओबामा की भारत यात्रा में खोने-पाने के मुद्दे पर बात शुरू करने से पहले यह जानना होगा कि हम वास्तव में अमेरिका से चाहते क्या थे? हमारी पहली और सबसे अहम ख्वाहिश द्विपक्षीय रिश्तों को नया मुकाम देने की थी।
अब जबकि मंगलवार को ओबामा की भारत यात्रा खत्म हो गई है, तब हम कह सकते हैं कि इस यात्रा ने द्विपक्षीय रिश्तों को मजबूत बनाने के लिए कई नए दरवाजे खोल दिए हैं। ओबामा और मोदी की अगुवाई में भारत-अमेरिका के रिश्तों में नई उम्मीदों के साथ नए युग की शुरुआत हुई है।
इस यात्रा में न केवल असैन्य परमाणु करार पर छह साल से चली आ रही अगर-मगर खत्म हुई, बल्कि भारत दुनिया को यह संदेश देने में कामयाब रहा कि मेक इन इंडिया अभियान के तहत उसकी अर्थव्यवस्था भरोसे के काबिल है।
कई बड़े मुद्दों पर दोनों देशों में भरोसा बढ़ा
दोनों देशों के बीच रक्षा, निवेश, व्यापार, आतंकवाद समेत कई क्षेत्रों में भी साथ आगे बढ़ने का भरोसा बढ़ा है। हां, इस यात्रा के बाद चीन की ओर से आई भारत को चेताने वाली प्रतिक्रिया और यूक्रेन मामले में भारत के रुख के उलट रूस को चेतावनी देने के लिए उसके ही मंच का इस्तेमाल जरूर चिंता पैदा करने वाली हैं।
भारत को चीन को संदेश देना होगा कि उसका और अमेरिका का मजबूत रिश्ता किसी तीसरे देश के लिए खतरा पैदा करने के लिए नहीं है। जबकि यूक्रेन मामले में ओबामा के रुख ने साफ कर दिया है कि विदेशी मोर्चे पर अभी भी कई ऐसे अहम मुद्दे हैं, जिन पर दोनों देशों की राय एक नहीं है।
सबसे पहले असैन्य परमाणु करार की बात करें तो यह धारणा सही नहीं है कि इसमें भारत को बहुत कुछ गंवाना पड़ा है। सच्चाई यह है कि दोनों देशों ने अपने रिश्तों की विश्वास की नींव पर नई, मजबूत और ऊंची इमारत बनाई है।
वहीं, अमेरिका का चार अरब डॉलर निवेश करने के भरोसा देने का अर्थ नहीं है कि यह रातों रात हो जाएगा। मगर इस अमेरिकी भरोसे के सहारे भारत दुनिया को अपनी अर्थव्यवस्था के संदर्भ में बड़ा सकारात्मक संदेश देने में कामयाब रहा है।