ओबामा दौरा: गले तो मिले लेकिन मिलेगा क्या?
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चार साल पहले जब राष्ट्रपति ओबामा पहली बार भारत के दौरे पर गए थे तो उनको सत्ता संभाले हुए मुश्किल से दो साल हुए थे। मनमोहन सिंह सरकार को भी अपनी दूसरी पारी खेलते हुए लगभग डेढ़ साल हो चुके थे।
अपनी पहली पारी में उन्होंने बुश प्रशासन के साथ एक ऐतिहासिक परमाणु समझौता किया था और पच्चीस-तीस बड़े मामलों पर अमेरिका के साथ सघन बातचीत चल रही थी। लेकिन दोनों ही तरफ़ एक सोच थी जिसके तहत अलग-अलग मामलों पर जो मतभेद थे उन्हें मतभेद की तरह नहीं बल्कि एक दूसरे के विरोध की तरह देखा जा रहा था और धीरे-धीरे वो रिश्तों में एक ठंडापन लाता गया।
एक नया तेवर है, एक नई महत्वाकांक्षा
आज जब ओबामा भारत पहुंचे हैं तो वहां एक नई सरकार है, एक नया तेवर है, एक नई महत्वाकांक्षा है। जिन मामलों पर मतभेद थे वो अभी भी बरकरार हैं लेकिन एक बात नई है। पिछले चार-पांच महीनों में दोनों ही देश आपसी मतभेदों की खुल कर बात करते हैं और उसके हल की कोशिशों पर बात करते हैं।
इसकी सबसे बड़ी मिसाल है प्रधानमंत्री मोदी की अमेरिका यात्रा के बाद विश्व व्यापार संगठन वार्ताओं में आई अड़चनों पर दोनों ही पक्षों की तरफ से निकाला गया हल और राष्ट्रपति ओबामा की तरफ से काफी हद तक उसका श्रेय भारत को देना।
वाशिंगटन में इस तरह के संकेत मिल रहे हैं कि शायद कुछ बड़े ऐलान हों इस दौरे पर ख़ासकर रक्षा उपकरणों के साझा उत्पादन के क्षेत्र में। लेकिन चार ऐसे बड़े मामले हैं जिनपर अगर राष्ट्रपति ओबामा भारत का रूख बदलने में कामयाब हो सके तो उसे अमेरिका में बड़ी उपलब्धि की तरह देखा जाएगा।
जलवायु परिवर्तन समझौते की कोशिश
जलवायु परिवर्तन और साफ सुथरी उर्जा राष्ट्रपति ओबामा के एजेंडा पर काफी ऊपर नजर आ रहा है। माना जा रहा है कि ओबामा ग्रीनहाउस गैसों में कटौती के मामले पर भारत के साथ भी कुछ वैसा ही समझौता करने की कोशिश करेंगे जो हाल ही उन्होंने चीन के साथ किया था। ओबामा के उप राष्ट्रीय सुरक्षा सलाहकार बेन रोड्स के अनुसार ये अगले अंतरराष्ट्रीय जलवायु की कामयाबी के लिए अहम हैं।
उनका कहना था, "हम सब ये जानते हैं कि ग्रीनहाउस गैस फैलानेवाली सभी बड़ी पार्टियां जब तक एक साथ नहीं आतीं, हम कामयाब नहीं हो सकते और राष्ट्रपति ओबामा प्रधानमंत्री मोदी के साथ इस पर बात करेंगे।"
हो सकता है कि उसके बदले में अमेरिका भारत को अरबों डॉलर की सौर और वायु उर्जा से जुड़ी टेक्नोलॉजी देने की बात करे लेकिन वहां भी एक अड़चन ये है कि भारत चाहता है कि उसमें भारत में बने सामानों का ही प्रयोग हो और विशेषज्ञों का कहना है कि उसे लागू करना असंभव होगा।
परमाणु लायबिलिटी कानून
दोनों ही पक्षों की तरफ से कोशिश हो रही है कि भारत ने परमाणु बिजली घरों के लिए उपकरण मुहैया करवाने वाली कंपनियों के लिए जो एक कानून बना रखा है, उसमें कोई बीच का रास्ता निकल सके।
भोपाल गैस त्रासदी को ध्यान में रखते हुए भारत ने कानून बनाया था कि परमाणु उर्जा से जुड़े प्रोजेक्टस में अगर कोई दुर्घटना होती है तो उसका खामियाजा उपकरण बनाने वाली कंपनी को देना होगा और ये अमेरीकी कंपनियों को कुबूल नहीं है। अगर इस दौरे में कोई बीच का रास्ता निकल सका जो अमेरीकी कंपनियों को मान्य हो तो ये भी ओबामा के लिए बेहद अच्छी खबर होगी।
आर्थिक सुधार की उम्मीद
भारत में आर्थिक सुधार की रफ़्तार, मूलभूत ढांचे में बेहतरी और निवेश के लिए एक बेहतर माहौल की उम्मीद भी ओबामा के एजेंडा पर होगा।
अमरीकी कंपनियों की लगातार शिकायत रही है कि भारत बहुत बड़ा बाजार जरूर है लेकिन वहां व्यापार करना उतना ही मुश्किल है। भारतीय उच्च अधिकारी भी यहां आश्वासन दे रहे हैं कि भारत में आर्थिक सुधारों की रफ्तार तेज हुई है।
हाल ही में वाशिंगटन में भारतीय औद्योगिक नीति के सचिव अमिताभ कांत ने कहा कि आज भारत का विदेशी निवेश कानून सबसे ज्यादा लचीला है लेकिन इन सब मामलों पर ओबामा अगर मोदी से कुछ ठोस हासिल कर पाए तो वो भी एक अच्छी खबर होगी उनके लिए।
इंटेलेक्चुअल प्रॉपर्टी राइट्स अहम
आपसी व्यापार में दोनों देशों में अभी भी कई मतभेद हैं लेकिन एक बड़ा मतभेद है पेटेंट क़ानून और इंटेलेक्चुअल प्रॉपर्टी राइट्स को लेकर जहां अमेरिकी दवा कंपनियां ओबामा प्रशासन पर भारत को कटघरे में खड़ा करने के लिए खासा दबाव डालती रही हैं।
इसी हफ्ते एक कांफ्रेंस में भारतीय मूल के अमेरिकी उप वाणिज्य मंत्री अरुण कुमार ने कहा, "इंटेलेक्चुअल प्रॉपर्टी राइट्स की रक्षा अहम है क्योंकि उनके बिना किसी नए अनुसंधान में पैसा लगाने का कोई मतलब नहीं रह जाता।"
भारत का इस पर रुख रहा है कि उसने कोई अंतरराष्ट्रीय कानून नहीं तोड़ा है और पेटेंट कानूनों में छूट वैसी ही दवाओं में दी गई है जो जीवनरक्षक हैं। अमेरिका में भी एक बड़ा तबका है जो भारतीय रुख का समर्थन करता है क्योंकि उनका कहना है कि उसी वजह से एड्स जैसी बीमारियों के लिए सस्ती दवा बन पाई हैं।
इस मामले पर ओबामा को भारत की तरफ से शायद ही कोई लचीला रुख मिल पाए। कुल मिलाकर देखा जाए तो ये दौरा काफी सकारात्मक माहौल में हो रहा है लेकिन इसकी कामयाबी इस बात से नहीं आंकी जाएगी कि ओबामा और मोदी की केमिस्ट्री कैसी थी या दोनों एक दूसरे को बराक या नरेंद्र कहकर बुला रहे हैं या नहीं। अब इसकी कामयाबी इस बात से आंकी जाएगी कि आपसी मामलों में किस तरह की प्रगति हुई है।