{"_id":"105feba4-d5eb-11e2-8462-d4ae52bc57c2","slug":"number-of-alliance-parties-are-decreasing-in-nda-and-upa","type":"story","status":"publish","title_hn":"एनडीए ही नहीं यूपीए का भी सिमटा कुनबा","category":{"title":"India News Archives","title_hn":"इंडिया न्यूज़ आर्काइव","slug":"india-news-archives"}}
एनडीए ही नहीं यूपीए का भी सिमटा कुनबा
नई दिल्ली/संजय मिश्र
Updated Sun, 16 Jun 2013 10:41 AM IST
विज्ञापन
देश के दो प्रमुख राजनीतिक गठबंधन यूपीए और एनडीए का कुनबा वाकई बुरी तरह सिमट चुका है। कभी 16 दलों वाला यूपीए जहां वर्तमान में चार दलों में सिमट कर रह गया है।
विज्ञापन
वहीं अटल बिहारी वाजपेयी की रहनुमाई में कभी 24 दलों का सियासी घोंसला रहे एनडीए में जदयू की विदाई के बाद केवल तीन ही दल रह जाने वाले हैं।
इन नई परिस्थितियों में देश की राजनीति में तीसरे विकल्प के लिए बेहद उपजाऊ जमीन तैयार हो रही है। शायद इसीलिए इस अनुकूल राजनीतिक परिस्थिति ने गैर यूपीए-गैर एनडीए दलों में तीसरे विकल्प की नींव डालने के लिए सियासी सरगर्मी तेज कर दी है।
विज्ञापन
नीतीश पर डोरे डालने लगी कांग्रेस
विज्ञापन
साल 2014 के आम चुनाव की वैतरणी पार करने के लिए जहां यूपीए और एनडीए के समक्ष अपना कुनबा बढ़ाने की चुनौती होगी। वहीं तीसरा विकल्प खड़ा करने की अगुवाई करने वाले दलों को गैर यूपीए-गैर एनडीए दलों को एक मंच पर लाने की चुनौती होगी।
हालांकि ठोस तीसरा विकल्प खड़ा करने की चुनौती मेंढक तौलने से कम नहीं होगा क्योंकि इनमें से अधिकांश क्षेत्रीय दलों के क्षत्रपों की निजी राजनीतिक महत्वाकांक्षाएं भी कम नहीं हैं।
सत्तारूढ़ और विपक्ष दोनों प्रमुख गठबंधनों के सिमटते कुनबे की बात करें तो यूपीए और एनडीए लगभग समान धरातल पर खड़े हैं। यूपीए में वर्ष 2004 में 16 दल थे। मगर अब यह मुख्य रूप से चार दलों में सिमट कर रह गया है।
फिलहाल यूपीए में कांग्रेस, एनसीपी, नेशनल कांफ्रेंस और रालोद को छोड़कर जितने भी दल हैं, उनके सांसदों की संख्या एक से ज्यादा नहीं है।
बीते कुछ वर्षों में यूपीए ने तृणमूल कांग्रेस, डीएमके, एमआईएम, जेएमएम, जेवीएम जैसे प्रमुख दलों का साथ गंवाया है। कांग्रेस को छोड़ दें तो यह गठबंधन इस समय महाराष्ट्र, जम्मू-कश्मीर और पश्चिम उत्तर प्रदेश तक सिमट कर रह गया है।
बीते आम चुनाव में चूंकि कांग्रेस को उम्मीदों से अधिक 206 सीटें मिल गई थी। इसलिए कुनबा घटने के बावजूद पार्टी परेशानी में नहीं आई।
मगर इस बार भ्रष्टाचार और महंगाई जैसे मामले के तूल पकड़ने से पार्टी के सीटों की संख्या घटने की संभावना जताई जा रही हैं। जाहिर है कि इसकी भरपाई करने के लिए उसे नए सहयोगी तलाशने होंगे।
दूसरी ओर इस मामले में एनडीए की हालत और भी पतली है। जब कांग्रेस विरोध की सियासत पर एनडीए मजबूती से उभरा था तब उसके पास अटल बिहारी वाजपेयी के चुंबकीय चेहरे का सहारा था। जिसकी वजह से एक इस गठबंधन में 24 के करीब दल थे। मगर नरेंद्र मोदी की अगुवाई वाली भाजपा के सामने कुनबा बढ़ाने की घनघोर चुनौती है।
रविवार को जदयू के अलग होने के बाद भाजपा के इतर यह गठबंधन महाराष्ट्र और पंजाब तक सिमट कर रह जाएगा। शिवसेना और आरपीआई महाराष्ट्र में तो अकाली दल पंजाब में उसके साथी रह जाएंगे।
एनडीए की अगुवाई करने वाली भाजपा के समक्ष मुश्किल यह है कि उसका कर्नाटक को छोड़कर दक्षिण के राज्यों और असम के अलावा पूर्वोत्तर राज्यों में नाम लेवा नहीं है।
इनमें कर्नाटक और असम में भी पार्टी की हालत बेहद पतली है। इसके अलावा पश्चिम बंगाल और उड़ीसा में भी पार्टी का कोई आधार नहीं है।
एनडीए और यूपीए के सिमट जाने से देश में तीसरे विकल्प के लिए उपजाऊ जमीन तैयार हुई है। इन दोनों गठबंधनों से इतर दल अपने अपने इलाके में बेहद मजबूत हैं।
जाहिर है कि इनकी संयुक्त संख्या इन दोनों गठबंधनों की हासिल की जाने वाली सीटों से ज्यादा हो सकती है। मगर तीसरे विकल्प की जमीन तैयार करने के लिए ऐसे सभी दलों को एक साथ मंच पर लाना बेहद मुश्किल होगा।
वैसे भी वर्तमान स्थिति में टीएमसी और वाम दल, डीएमके और एआईएडीएमके, सपा और बसपा, जेवीएम और जेएमएम एक साथ शायद ही आएंगे।
अगर नीतीश का ममता बनर्जी, नवीन पटनायक और बाबूलाल मरांडी के साथ फेडरल फ्रंट का फार्मूला सफल रहता है तो वाम दल एक अलग मोर्चा की तैयारी में जुटेंगे।