फ्री ई-पेपर
पर्सनलाइज़्ड फ़ीड
पर्सनलाइज़्ड नोटिफ़िकेशन
चलते-फिरते ख़बरें
लॉयल्टी रिवॉर्ड्स
डाउनलोड करें

सब्सक्राइब करें
Hindi News ›   News Archives ›   India News Archives ›   NTR- face of new politics

नई राजनीति के सारथी बने थे एनटीआर

Sat, 08 Mar 2014 07:52 PM IST
वेद प्रकाश उनियाल
वेद प्रकाश उनियाल Updated Sat, 08 Mar 2014 07:52 PM IST
विज्ञापन
NTR- face of new politics

यह अस्सी का दशक था। कांग्रेस के खिलाफ खड़ी हुई जनता पार्टी कई हिस्सों में बिखर चुकी थी। केंद्र और कई राज्यों में फिर कांग्रेस का परचम लहरा रहा था। मगर आंध्र प्रदेश में बार-बार मुख्यमंत्री बदलने, चुने नेताओं के साथ क्षत्रपों की तरह व्यवहार और भ्रष्टाचार से आहत तेलुगू जनता के मन में बदलाव की आग सुलग रही थी। 1956 से 1983 तक राज्य में दस मुख्यमंत्री देखने वाली जनता अब स्थायित्व चाहती थी।

विज्ञापन


ऐसे समय में राज्य को कांग्रेस से मुक्त करने और तेलुगू स्वाभिमान के नाम पर जब तेलगू फिल्मों के लोकप्रिय स्टार एनटीआर 'चैतन्य रथ' पर सवार होकर राजनीति में उतरे, तो लोग उनके लिए उमड़ पड़े। तेलुगू राजनीति अपना नया अध्याय लिख चुकी थी। देखते ही देखते वह राज्य के मुख्यमंत्री बन गए। वह यहीं नहीं रुके।
विज्ञापन


जिन तेलुगू लोगों ने उन्हें फिल्मों में कृष्ण की भूमिका में कई बार देखा, वह समय आने पर भारतीय राजनीति की तीसरी शक्ति के सारथी भी बने। भारतीय राजनीति में वह अपनी लोकलुभावन नीतियों के लिए जाने गए।

विज्ञापन
विज्ञापन

पौराणिक फिल्मों का नायक

NTR- face of new politics

आंध्र के कृष्णा जिले के नीमाकुरू गांव की अगर कहीं कुछ पहचान थी, तो यही कि वहां थोड़ी हरियाली थी। किसी पिछड़े से गांव की जो दशा हो सकती है, वह सब कुछ इस गांव में झलकता था। लेकिन इसी गांव को एक विशिष्ट पहचान एनटीआर ने दिलाई। 20 मई 1923 को पहले एक अभिनेता के तौर पर और बाद में राजनीति के क्षितिज पर एनटीआर का सितारा चमका तो नीमाकुरू को भी शोहरत मिली। तेलुगू फिल्मों में राम और कृष्ण की पौराणिक भूमिकाओं ने उन्हें तेलुगू लोगों में मशहूर किया।

विजयवाड़ा में कॉलेज में पढ़ते हुए उनका थियेटर की तरफ रुझान हुआ। मशहूर नाटककार वी सत्यनारायण के एक नाटक में उन्होंने नायिका का रोल भी किया। आगे की पढ़ाई के लिए गुंटूर आए तो फिर कई नाटकों में हिस्सा लिया। एनटीआर का मद्रास सर्विस कमीशन की परीक्षा में भी चयन हुआ और वह सब रजिस्टार बन गए। लेकिन उनका मन तो कला में रमा हुआ था। आखिर 1949 में 'माया देशम' में उन्हें एक पुलिस इंस्पेक्टर की भूमिका मिली। यह सिलसिला फिर थमा नहीं। उनकी पातला भैरवी, माया बाजार, कृष्णा श्री कृष्णार्जुनयुद्धम, लव कुश सीताराम कल्यानंम जैसी यादगार फिल्में आईं।

थोडू डोंगालु सीतारामकल्यानम और वाराकटमन जैसी फिल्म राष्ट्रीय अवार्ड से सम्मानित हुई। तेलुगू फिल्मों में वह कृष्ण की भूमिकाओं में 17 बार आए। कई फिल्मों में राम की भूमिका के साथ-साथ महाभारत के भीष्म, अर्जुन, कर्ण के  पात्रों को उन्होंने फिल्मी पर्दे पर जिया। उनकी लोकप्रियता इस कदर थी कि 1963 में लव कुश फिल्म ने एक करोड़ रुपये की कमाई की। इस फिल्म में वह राम की भूमिका में थे। तेलुगू फिल्म सिनेमा में उन्होंने तीन सौ से ज्यादा फिल्मों में अभिनय किया। इनमें कई फिल्में सामाजिक परिवेश और लोकसंस्कृति पर भी बनी थी। भारत सरकार ने 1968 में उन्हें तेलुगू फिल्म के लिए अविस्मरणीय योगदान देने पर पद्मश्री से सम्मानित किया।

कांग्रेस से मोहभंग

NTR- face of new politics

तेलुगू जनता महसूस कर रही थी कि केंद्र उनके नेताओं को क्षत्रप की तरह महसूस करता है और उनके ऊपर मुख्यमंत्री थोपे जाते हैं। साथ ही भ्रष्टाचार और अव्यवस्था के माहौल में राज्य का विकास थम गया था। हाल यह था कि 1956 से 1983 तक राज्य में दस मुख्यमंत्री बदले गए। लेकिन लोगों की आवाज मुखर नहीं हो पा रही थी।

शायद उनका आक्रोश किसी नायक की तलाश कर रहा था। आंध्र में राजनीतिक कुहासा छंट नहीं रहा था। टी अंजैया का प्रशासनिक- राजनीतिक अनुभव भी आंध्र प्रदेश को गति नहीं दे पा रहा था। ऐसे समय में यह भी खबर उड़ी थी कि राजीव गांधी ने हैदराबाद हवाईअड्डे पर आंध्र के चीफ मिनिस्टर को किसी बात पर टोक दिया था।

ऐसी तमाम बातों ने दिल्ली की सत्ता के खिलाफ तेलुगू जनता के मन में असंतोष के बीज बो दिए। यही कारण है कि जब एनटीआर का राजनीति में उदय हुआ, तो जनता ने उन्हें अपना नायक मान लिया। एनटीआर ने तेलुगू भावनाओं को समझते हुए उन्हें अहसास कराया कि कांग्रेस से मुक्ति पानी है, और जिस तरह आंध्र प्रदेश के मुख्यमंत्रियों को जब तब बदला जाता है, उस सिस्टम को तोड़ना है। यह एक नई लहर थी।

चैतन्य रथ से 75,000 किमी

NTR- face of new politics

'तेलगू वारी अम्मागौरवम' यानी तेलुगू लोगों का स्वाभिमान का जयघोष पूरे राज्य में गूंज उठा। भारतीय राजनीति में रथ बाद में बहुत से नेताओं के चले, लेकिन चैतन्य रथ पहली बार लोगों के बीच था। पीले झंडे बैनरों और पोस्टरों से सजा यह रथ जिस इलाके से गुजरा, वहीं राजनीति में परिवर्तन की आहट सुनी गई।

जिस एनटीआर की एक झलक पाने के लिए लोग बेताब रहते थे, वह अब उनके करीब आ रहे थे। उनके कहे एक एक शब्द पर लोग गौर कर रहे थे। एनटीआर फिल्म की चकाचौंध को समझते थे। उन्होंने राजनीति में भी चमक दमक के अर्थ को समझा। अपना रथ सजाया। आकर्षक नारे गढ़े। फिल्मी शोहरत को राजनीतिक मंच पर भुनाने की जितनी कोशिश हो सकती थी उनके जरिए की गई। यह चैतन्य रथ के आकार की एक गाड़ी थी।

जिसमें रेशमी गेरुआ धारण किए और माथे पर चंदन लगाए एनटीआर बैठते थे। रथ पर अपने आसन से वह दूर दूर तक जनता को नजर आते थे। चैतन्य रथ राज्य भर में करीब 75 हजार किमी घूमा। हर जगह परिवर्तन और स्वाभिमान की बात कह गया। देखते ही देखते वह राज्य के मुख्यमंत्री बन गए।

सत्ता की उथल पुथल

NTR- face of new politics

कांग्रेस आंध्र में एनटीआर की नई शक्ति को भांप चुकी थी। ऐसे में जल्दी चुनाव करा लेने का फार्मूला भी काम नहीं आया। चुनाव के नतीजे आशानुरूप थे। 294 सीटों वाली विधानसभा में तेलुगू देशम 193 और सहयोगी संजय विचार मंच को तीन सीट मिली थी। तब चुने हुए विधायकों में अधिकांश नए युवा थे। चुनाव से पहले एनटीआर ने प्रत्याशियों की सूची पर अच्छा खासा मंथन किया था। विभिन्न क्षेत्रों के कई दक्ष लोग इस नए दल में शामिल हुए।

संघर्ष कामयाब हुआ था। 9 जनवरी 1983 को एनटी रामाराव राज्य के नए मुख्यमंत्री बने। ऐसे समय में जब तेलुगू देशम की लहर थी, उसके नेता स्वयं गोदीवाडा और तिरुपति से जीत कर आए थे। एनटीआर ने शासन अपने हाथों में लिया और अपनी लोकलुभावन फैसलों को अमल में लाना शुरू किया। लेकिन आंध्र की राजनीति को डगमगाने के लिए फिर राज्यपाल रामलाल के हाथों दांव चला गया।

ऐसे समय जब एनटीआर अपनी हार्ट सर्जरी कराने के लिए अमेरिका गए हुए थे, रामलाल ने उनकी सरकार बर्खास्त कर उनके ही वित्त मंत्री एन भास्कर राव को मुख्यमंत्री पद की शपथ दिला दी। यह प्रचारित किया गया कि तेलुगू देशम के ज्यादातर विधायक एन भास्कर राव के साथ हैं। एनटीआर ने राजभवन में विधायकों की परेड भी कराई। लेकिन रामलाल नहीं माने। ऐसे में संग्राम होना ही था। फिर न्याय के लिए चैतन्य रथ राज्य में घूमा। तब जनता पार्टी, भाजपा, लेफ्ट फ्रंट, डीएमके, नेशनल काफ्रेंस जैसे दल एनटीआर के साथ थे। संघर्ष चला। आखिर एनटीआर का दबदबा ही काम आया। राज्य में शंकर दयाल शर्मा नए राज्यपाल बनाए गए और सत्ता एक बार फिर एनटीआर के हाथों में थी।

लोकलुभावन योजनाएं

NTR- face of new politics

राजनीति में लोकप्रिय योजनाओं के लिए अमल में लाने और बेहतर कार्यान्वित करने का श्रेय उनको जाता है। गरीब बच्चों के लिए मिड डे मील जैसी लोकप्रिय योजनाओं की सोच हालांकि तमिलनाडु में अन्नादुरई ने की थी और करुणानिधि रामचंद्रन जैसे नेता भी इसे अमल में लाने का प्रयास करते रहे, लेकिन उसे पहली बार लोकप्रियता आंध्र में मिली। तेलुगू गंगा प्रोजेक्ट के लिए वह याद किए जाते रहेंगे। एनटीआर आंध्र की राजनीति में एकाएक आए और पूरी तरह छा गए।

बेशक उनके साथ ग्लैमर फिल्मी छवि जुड़ी थी, लेकिन राजनीति में आकर उन्होंने सामाजिक धरातल पर काम करना शुरू किया था। वह किसी लोकप्रिय पार्टी का एक चेहरा बन कर नहीं रहे। बल्कि उन्होंने राजनीति को कई नए मुहावरे और जमीन दी। जिन लोकलुभावन तरीकों को आज के नेता अपनी खोज कहकर इतराते हैं, उनका परिचय एनटीआर ने अस्सी में ही करा दिया था। सामाजिक न्याय के लिए वह हमेशा जूझते रहे। गरीबी की रेखा से नीचे रहने वाले लोगों के लिए सस्ता अनाज वस्त्र और मकान की योजनाओं को मूर्त रूप देने वाले नेता के तौर पर उन्हें याद किया जाएगा।

महिलाओं के अधिकार के लिए बिल लाने की वकालत करने की बात हो या गरीब छात्रों के लिए मिड डे मील स्कीम या दो रुपए किलो चावल जैसे योजनाओं को शुरू करने का श्रेय उन्हें दिया जाएगा। एनटीआर की आंध्र की राजनीति में पकड़ बनी रही। यहां तक कि जब 1984 में इंदिराजी की हत्या के बाद पूरे देश में कांग्रेस के लिए सहानुभूति की लहर चल रही थी।

जब एनटीआर विपक्ष की राजनीति करने लगे

NTR- face of new politics

लेकिन आंध्र प्रदेश में यह हवा नहीं चली। यहां तक कि लोकसभा में पहली बार मुख्य विपक्षी पार्टी के तौर पर क्षेत्रीय पार्टी तेलुगू देशम को सामने आई। एनटीआर ने मौके को भांपते हुए फिर से चुनाव कराए और स्पष्ट बहुमत हासिल किया। यह उनकी लहर थी कि हिंदुपुर, नलगोंडा और गुडीवाडा के जिन तीन विधानसभा क्षेत्रों से वह स्वयं चुनाव लड़े तीनों में उन्हें जीत हासिल हुई।

तब राजनीतिक समीक्षकों ने यही माना कि एनटीआर की लोकलुभावन नीतियों को राज्य की जनता ने पसंद किया। लेकिन पांच वर्ष तक यह स्थिति कायम नहीं रह पाई। चुनाव आते आते तेलुगू देशम सरकार का प्रभाव कम होने लगा। हालांकि यह भी कहा जाता है कि एनटीआर खराब स्वास्थ्य के चलते चुनाव प्रचार की मुहीम ठीक से नही कर पाए।

इससे पहले उन्हें हल्का दिल का दौरा पड़ा था। शासन विरोधी जनभावना हो या एनटीआर का चुनाव में पूरी तरह सक्रिय न हो पाना, इसका लाभ कांग्रेस उठा ले गई। कांग्रेस को करीब दस वर्ष बाद फिर सत्ता हासिल हुई। तेलुगू देशम के नेता एनटीआर किसी तरह एक सीट पर जीते और राज्य में विपक्ष की राजनीति करने लगे।

तीसरे मोर्चे के सारथी

NTR- face of new politics

जिन तेलुगू लोगों ने उन्हें फिल्मों में कृष्ण की भूमिका में कई बार देखा, वह समय आने पर भारतीय राजनीति की तीसरी शक्ति के सारथी भी बने। अब एनटीआर और तेलुगू देशम के लिए नई दिशा की ओर बढ़ना था। इसी समय एनटीआर राष्ट्रीय राजनीति में कूदे। यह केवल राष्ट्रीय राजनीति के लिए रुझान भर नहीं था, बल्कि जनता दल असम परिषद, इंडियन कांग्रेस के साथ उनकी पार्टी राष्ट्रीय फलक पर नई इबारत लिखने जा रही थी। एनटीआर इसके सूत्रधार थे।

भाजपा और लेफ्ट पार्टियों के सहयोग से केंद्र में 1989 में विश्वनाथ प्रताप सिंह की सरकार बनी थी। जब देवीलाल ने विश्वनाथ प्रताप सिंह को प्रधानमंत्री बनाने की घोषणा की थी, तो चंद्रशेखर और हेमवती नंदन बहुगुणा इसके पक्ष में नहीं थे। लेकिन एनटीआर ने विप्र सिंह के लिए जोरदार पहल की। एनटीआर आंध्र विधानसभा में विपक्ष के नेता बने रहे, लेकिन राष्ट्रीय राजनीति में उनकी सक्रियता बनी हुई थी।

उधर राज्य में कांग्रेस ने फिर अपनी गलती दोहराई। मुख्यमंत्री ताश के पत्तों की तरह फेंटे जाने लगे। फिर पांच साल में पांच मुख्यमंत्री बदले। नतीजा यही हुआ कि कांग्रेस केवल 26 सीट जीत सकी। टीडीपी ने अपने सहयोगियों के साथ 250 सीटों पर जीत हासिल की।

पारिवारिक कलह

NTR- face of new politics

एनटीआर की तीसरी पारी केवल नौ महीने ही चली। पार्टी और उनके कुनबे में अंतर्विरोध गहराने लगा था। एनटीआर अपने इलाज के लिए अमेरिका में थे, और इधर हैदराबाद में उनके दामाद चंद्रबाबू नायडू ने बगावत कर दी। 23 अगस्त 1995 की बगावत का आधार यही बनाया कि एनटीआर अपनी दूसरी पत्नी लक्ष्मी पार्वती को पार्टी सौपना चाहते हैं जो आंध्र के लिए ठीक नहीं है। हैदराबाद के वायसराय होटल में नायडू के साथ टीडीपी के ज्यादातर विधायक साथ जुटे थे।

एनटीआर की सत्ता के खिलाफ बगावत हो गई थी। एनटीआर ने यही कहा था कि इस बगावत से उन्हें औरंगजेब की याद आती हैं, जिसने शहंशाह को तख्त से बेदखल कर दिया था। बताया जाता है कि चंद्रबाबू नायडू ने वेंकटेश्वर राव और हरिकृष्ण जैसे प्रभावशाली नेताओं को इस बगावत के बदले सरकार और पार्टी में महत्वपूर्ण पद देने का आश्वासन दिया था। लेकिन बाद में इस वायदे को नहीं निभाया। लेकिन आंध्र में अब एनटीआर अतीत बन चुके थे।

अस्वस्थ होने से एनटीआर अपने ही यादरे में सिमट गए। एनटीआर ने सत्ता की उथलपुथल कई बार झेली, यहां तक कि दामाद चंद्रबाबू नायडू की बगावत भी। सिंहासन छीना गया और वह कहते रहे इतिहास ने फिर दोहराया है, औरंगजेब ने शाहजहां का तख्त फिर छीन लिया है।

दोस्तों के दोस्त

NTR- face of new politics

एनटीआर और एम जी रामाचंद्रन में गहरी मित्रता थी। ऐसा समय भी आया कि एम जी रामाचंद्रन जब बीमार होने की वजह से चुनाव प्रचार नहीं कर सके, तो एनटीआर ने तमिलनाडू में जाकर उनके लिए  प्रचार किया। वह भी तब जबकि अन्नाद्रमुक कांग्रेस से रिश्ता जोड़े हुए थी। ऐसे में उन्होंने पार्टी के अंदर किसी आलोचना की परवाह न करते हुए तमिलनाडु में जाकर अन्ना दम्रुक के लिए प्रचार किया।

तेलुगू समाज से उन्हें पर्याप्त आदर मिला। उनकी छवि हमेशा नायक वाली रही। उनमें जूझने का, आगे बढ़ते रहने का हौसला था, लेकिन स्वास्थ्य उनके आड़े आया। ऐसे समय में जब क्षेत्रीय दलों का प्रभाव तेजी से बढ़ा है और तीसरी शक्ति की पहचान को किसी न किसी तरह रेखांकित किया जाता है, तब एनटीआर बार-बार याद आते हैं। समय के साथ इस बिखरती शक्ति के वह फिर सूत्रधार बन सकते थे।

विज्ञापन
विज्ञापन
विज्ञापन
विज्ञापन
विज्ञापन

एड फ्री अनुभव के लिए अमर उजाला प्रीमियम सब्सक्राइब करें

Next Article

AU ऐप में पढ़ें

Followed