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क्या हैं उग्रवादी संगठन से शांति समझौते के मायने

Tue, 04 Aug 2015 01:26 PM IST
Updated Tue, 04 Aug 2015 01:26 PM IST
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NSCN peace agreement with india

केंद्र सरकार के साथ करीब दो दशक से बातचीत कर रही एनएससीएन (आईएम) नगालैंड और आसपास के इलाके में पीपुल्स रिपब्लिक ऑफ नगालैंड के नाम से अपनी स्वायत्त सरकार चला रही है।

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दरअसल, आजादी के बाद से ही नगा के करीब आधा दर्जन जनजाति मिलकर नगालिंगम नाम से अलग देश की मांग कर रहे थे। सोमवार को नरेंद्र मोदी सरकार और एनएससीएन (आईएम) ने समझौते के जरिये छह दशक पुराने उग्रवाद का राजनीतिक हल निकालने में सफलता हासिल की है।
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समझौते पर हस्ताक्षर से पहले पीएम मोदी ने ट्वीट कर कहा कि पूरा देश सोमवार साढे़ छह बजे ऐतिहासिक क्षण का गवाह बनने वाला है।

सरकारी सूत्रों के मुताबिक, इस समझौते का ब्योरा फिलहाल जारी नहीं किया जा रहा है। सूत्रों के मुताबिक प्रधानमंत्री कार्यालय, राष्ट्रीय सुरक्षा सलाहकार और गृह मंत्रालय के स्तर पर तैयार किए गए इस ऐतिहासिक मसौदे के लिए थोड़ा और इंतजार करना पडे़गा।
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इस नतीजे तक पहुंचने में केंद्र की ओर से नियुक्त वार्ताकार आरएन रवि की अहम भूमिका रही है। इन्होंने नगालैंड के करीब दर्जन भर संस्थाओं, युवाओं, विभिन्न जनजाति समूहों और सांस्कृतिक गुटों से बातचीत की।

एनएससीएन गुटों में मतभेद की शुरुआत

NSCN peace agreement with india

1988 तक केंद्र से वार्ता को लेकर आईजैक, मोइवा और खापलांग के बीच मतभेद शुरू हो गया। मतभेद के बीच ही 1997 में एनएससीएन ने सरकार के साथ संघर्ष विराम का करार किया।

2001 तक वार्ता विरोधी खापलांग गुट अलग हो गया। सूत्रों के मुताबिक, चीन की मदद से खापलांग ने म्यांमार में अपना गढ़ बना कर आक्रामक तेवर बरकरार रखा जबकि आईएम गुट सरकार के साथ बातचीत की कोशिश करता रहा।

खापलांग गुट ने जून में सेना पर किया हमला
बातचीत की लंबी कोशिशों को परवान चढ़ता देख खापलांग गुट ने जून में नगालैंड में सेना के काफिले पर बर्बर हमला कर एक बार फिर अपनी मंशा साफ कर दी।

इस हमले के बाद सेना ने खापलांग के खिलाफ मोर्चा खोल दिया। अब 70 साल से अधिक का हो चुका खापलांग म्यांमार के अस्पताल में अपना इलाज करवा रहा है। सरकार ने म्यांमार के साथ मिलकर खापलांग के कैंपों को खत्म करने के लिए ब्लू प्रिंट तैयार कर लिया है।

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