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अब करूंगी तेरे साथ गंदी बात...

Thu, 26 Nov 2015 05:00 PM IST
शालू यादव बीबीसी संवाददाता
शालू यादव बीबीसी संवाददाता Updated Thu, 26 Nov 2015 05:00 PM IST
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'Now we will do gandi Baat'

"वो कहते हैं न पर्सनल इज पॉलिटिकल।।।तो बस ये मेरा पर्सनल यानी निजी मुद्दा था और मैंने फैसला किया कि मैं समाज की सभी बहनों के लिए यह लड़ाई लडूंगी।"

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मिलिए मुमताज शेख से जो भारत की आर्थिक राजधानी कहे जाने वाले शहर मुंबई में महिलाओं के पेशाब करने की जगह के लिए लड़ रही हैं। आप सोच रहे होंगे कि रोजमर्रा की एक जरूरत को महिलाओं को हक के रूप में क्यों मांगना पड़ा है? वह इसलिए क्योंकि सार्वजनिक शौचालयों में मूत्रालय के इस्तेमाल के लिए पुरुषों से पैसा नहीं लिया जाता जबकि महिलाओं से पैसे लिए जाते हैं।
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मुमताज शेख इसे बदलने के लिए एक नई मुहिम चला रही हैं। मुंबई में बस्तियों की पतली गलियों में सरपट चलते हुए मुमताज कहती हैं, "मुंबई शहर सोता नहीं है, लेकिन जो लोग इस शहर को संवारने में अपने दिन-रात गुजार देते हैं, उनकी मूलभूत जरूरतों पर ध्यान नहीं दिया जाता। खासतौर पर महिलाओं की।
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वैसे तो पर्याप्त सार्वजनिक शौचालय हैं नहीं, और जो हैं भी वो महिलाओं से पेशाब करने के भी पैसे मांगते हैं। क्यों दूं मैं पैसे? सिर्फ इसलिए कि एक महिला होने के नाते मुझे पेशाब जाने के लिए भी एक चारदीवारी की जरूरत पड़ती है।"

हम महिलाएं क्या करें?

'Now we will do gandi Baat'

मुंबई की बस्तियों में अगर सुबह के वक्त देखें तो हर सार्वजनिक शौचालय के बाहर महिलाओं की लंबी कतार दिखती है। इन महिलाओं की हर दिन की शुरुआत इसी तरह होती है।

सुबह शौचालय जाने के लिए इन्हें लगभग आधा घंटा इस कतार में इंतजार करना पड़ता है, क्योंकि मुंबई की बस्तियों के घरों में शौचालय ही नहीं हैं। कतार में खड़ी महिलाओं के चेहरे पर गुस्सा साफ झलकता है।

शौचालय का इस्तेमाल कर जैसे ही वो बाहर आती हैं, तो वहां रखी मेज पर दो रुपए का सिक्का रख घर की ओर निकल पड़ती हैं।

झल्लाते हुए कहती हैं, "आदमी का क्या है, वो तो कहीं भी दीवार के आगे खड़े हो जाते हैं, लेकिन हम महिलाएं क्या करें? हर दिन अगर पांच बार भी जाना हो तो 10 रुपए लगते हैं। हम गरीब कहां से लाएं इतना पैसा? पूरा दिन टॉयलेट न जाने के लिए पानी तक
नहीं पीते हम।"

मुंबई में कई महिलाएं पैसे बचाने के लिए शौचालयों की जगह खुले में पेशाब करने जाती हैं। लेकिन वो ये भी जानती हैं कि सुरक्षा के नजरिए से यह उनके लिए जोखिम भरा हो सकता है।

भारत में पिछले कुछ सालों में कई ऐसी घटनाएं सामने आई हैं जब एकांत में पेशाब करने जा रही महिलाएं बलात्कार का शिकार हुई हैं।

'राइट टु पी के जरिए महिलाओं को हक दिला रहीं मुमताज'

'Now we will do gandi Baat'

पिछले चार साल से मुमताज शेख एक नायाब मुहिम चला रही हैं, जिसका नाम है- 'राइट टु पी' यानी पेशाब करने का अधिकार। उनकी मांग है कि मुंबई की नगरपालिका महिलाओं के लिए मुफ्त और सुरक्षित मूत्रालय मुहैया करवाए। लेकिन मुकाम तक पहुंचने का रास्ता आसान नहीं था।

वह कहती हैं, "जब हम नगर निगम अधिकारियों के पास अपनी मांग लेकर पहुंचे, तो उन्होंने इसे हंसी में उड़ा दिया। कहा कि अब हम ऐसे मुद्दों पर भी बात करेंगे? यह दर्शाता है कि भारत में ज्यादातर लोगों की मानसिकता यही है कि महिलाओं की कोई जरूरतें नहीं है, और अगर हैं भी तो उन पर ध्यान देने की कोई जरूरत नहीं है।"

लेकिन जब अधिकारियों ने उनकी मांग अनसुना कर दी, तो उनका ध्यान खींचने के लिए मुमताज ने एक नायाब तरीका ढूंढ़ा। हंसते हुए वो बताती हैं, "हमने उन्हें कहा कि अगर उन्होंने हमारी मांगें नहीं सुनीं तो हम महिलाएं उनके दफ्तर के बाहर खुले में पेशाब करने के लिए बैठ जाएंगी। बस ये सुनते ही अधिकारियों ने हमें बैठक के लिए बुला लिया। और आज आलम ये है कि हम नगर निगम के साथ मिलकर लगभग 90 मुफ्त मूत्रालय बनवाने को योजना पर काम कर रहे हैं।"

'राइट टु पी' मुहिम शहर में जगह-जगह नुक्कड़ नाटक कर लोगों में जागरूकता बढ़ाने में लगी है।नाटक के एक भाग में महिलाएं एक पुरुष को डांटते हुए गाना गा रही हैं– अच्छी बात कर ली बहुत, अब करूंगी तेरे साथ गंदी बात, गंदी गंदी गंदी गंदी गंदी बात! यहां गंदी बात से मतलब जाहिर है– अगर महिला पेशाब जैसी अपनी जरूरतों की बात करे, तो समाज उसे गंदी बात ही तो कहता है।

दर्शकों के बीच मौजूद कुछ महिलाएं जहां इस नाटक को बड़े ध्यान से देख और सुन रही हैं, तो कुछ महिलाएं शर्म के मारे इधर-उधर नजरें घुमा रही हैं। शायद यही इस बात का संकेत है कि भारत में महिलाओं की जरूरतों और उनकी आवाज को सदियों से दबाया जाता रहा है।

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