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'अभी तो पार्टी शुरू हुई है..'

Mon, 19 Oct 2015 03:44 PM IST
वुसतुल्लाह ख़ान/बीबीसी संवाददाता, पाकिस्तान
वुसतुल्लाह ख़ान/बीबीसी संवाददाता, पाकिस्तान Updated Mon, 19 Oct 2015 03:44 PM IST
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now the party begins

कोई 11 साल पहले अहमदाबाद के साबरमती आश्रम में घूमते-घूमते एक गांधीवादी से मुलाकात हुई।हम दोनों उसी बरामदे में आलथी-पालथी मारकर बैठ गए जहां गांधी जी चरखा चलाते थे। मैंने बातों-बातों में कहा कि अहमदाबाद की हवा में बडी घुटन है।वो कहने लगे कि हां, है तो। मगर गांधी जी कहते थे कि घुटन ऐसे ही होती है जैसे दूध के ऊपर जमी मलाई।

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फूंक मारते रहने से मलाई एक तरफ हो जाती है और नीचे दूध ही दूध होता है।समाज भी इसी दूध की तरह है जिसपर कभी-कभी घुटन की तह जम जाती है। इससे घबराना नहीं चाहिए। मलाई जितनी भी मोटी हो जीवन के मजेदार दूध से गहरी नहीं हो सकती। आज जाने क्यों मुझे ग्याहर साल पहले कि यह बात बहुत याद आ रही है।

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1975 में लगी इमरजेंसी के असर?

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मुझे याद है जब जनरल जिया-उल-हक तख्तापलट कर खुद सत्ता में आए और उन्होंने जीवन की हर करवट को घुटन की रस्सियों से जकडना शुरू किया तो ऐसा लगता था कि हम सब की सांस रूक जाएगी।ऐसा सन्नाटा जैसे कब्रिस्तान...। हर आदमी बात करते-करते रूक जाता, इधर-उधर देखना शुरू कर देता मगर फिर जब मुट्ठी में बंद जब्र की रेत आहिस्ता-आहिस्ता गिरनी शुरू हुई तो गर्म हवा बदलने लगी।

हां, आज भी पाकिस्तान की हवा में उस जमाने की बू बसी है लेकिन कहने वालों के लिए भी आज बहुत गुंजाइश है।देखिए ना, मछली का ट्रक किसी सडक से गुजर जाए तो आसपास से अगले दिन तक बास नहीं जाती।घुटन भी यही है। काफी तेज है लेकिन जाते-जाते ही जाती है।क्या 1975 में लगी इमरजेंसी के असर आज तक महसूस नहीं होते?

जिन समाजों को घुटन का तर्जुबा नहीं होता उनका बहुत सा वक्त यही समझने में लग जाता है कि हमारे साथ हुआ क्या?लेकिन पहले एक को समझ में आता है फिर एक से दो को, दो से चार को, फिर आवाजें शोर बनती चली जाती हैं और खामोशी दुब दबाकर सरकना शुरू कर देती है।

एंडरसन की वो कहानी

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एंडरसन की वो कहानी तो हम लोगों में से बहुतों ने पढी-सुनी होगी कि राजा रथ पर सवार महल से निकला था और उसने अपने ख्याल में दुनिया का सबसे महंगा लिबास पहन रखा था।हर तरफ वाह-वाह का शोर था। मगर भीड में खडा एक बच्चा चिल्ला उठा आप लोग किस बात पर वाह-वाह कर रहे हैं।राजा तो नंगा है उसने तो कुछ भी नहीं पहना हुआ है।

और फिर ये बात एक कान से दूसरे कान तक फैलती चली गई।हर तरफ हल्ला मच गया कि राजा नंगा है।हम पाकिस्तानियों ने कोई तीर मारा हो या नहीं पर 68 साल में ये जरूर सीख लिया कि जब हर तरफ चुप्पी लग जाए तो उसे तोडना कैसे है।आम जनता का क्या है, उसके बारे में तो अहमद फराज कह चुके हैं, "ये क्या सितम है कि अहदे सितम के जाते ही तमाम खल्क मेरी हमनवां निकलती है।"

आप इस पगदंडी पर अभी नए-नए चढे हैं। आहिस्ता-आहिस्ता धुंए के दरमयान से निकलना भी सीख लिजिए।अभी तो पार्टी शुरू हुई है। बस ये बात गिरह से बांध लीजिए कि तिनके-तिनके से बनाया एकता का घोंसला तिनके-तिनके हो भी जाए तो उसके बाद फिर तिनका-तिनका जोड कर बना लेंगे।जाने क्या कहने बैठा था और क्या कहता चला गया। होता है कभी-कभी ऐसा भी होता है।

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