अब स्कूल में खेलेंगे बच्चे गोटी-कंचे
"यह एक मजेदार खेल है। अगर आप अपने पैर लकीर के भीतर नहीं रखते हैं और जब हर कोई जोर-जोर से हँस रहा होता है या फिर चिल्ला रहा होता है तो बहुत मजा आता है।"
ये कहने वाली प्रज्ञा उन छह लड़कियों में से एक है जो कूद फांद कर खेले जाने वाले हॉपस्कॉच या स्तापू खेलने की शौकीन हैं। पहली क्लास में पढ़ने वाली प्रतीक्षा बाई प्रज्ञा को बीच में टोकते हुए कहती हैं, "लेकिन यह कुछ-कुछ एक पैर पर कूदने जैसा खेल है।"
तभी वहां मौजूद दूसरी लड़कियां इस पारंपरिक खेल की बारीकियाँ समझाने की कोशिश में लग जाती हैं। लेकिन उनके कोच उन्हें कुछ अलग ही चीज सिखाने की तैयारी कर रहे हैं। वे सेवेन स्टोंस या पारंपरिक भारतीय खेल लागोरी की तैयारियों में लगे हुए हैं।
इस खेल में लड़के-लड़कियों को गेंद पहले फेंकने के लिए एक दूसरे से जूझना पड़ता है।
सिलेबस का हिस्सा
दो दशक पहले स्कूल गए लोगों को ये किसी गुनाह की तरह लग सकता है। जब वे छोटे रहे होंगे तो उनके शिक्षकों और हेडमास्टर्स ने उनकी जेबों की तलाशी ली होगी और पत्थर के टुकड़े 'जब्त' किए होंगे।
लेकिन ये बीते जमाने की बातें हैं, अब हालात बदल गए हैं। स्तापू, लागोरी, गोटी या कंचा अब बंगलौर के कुछ स्कूलों में सिलेबस का हिस्सा बन गए हैं।
ये पारंपरिक खेल विशुद्ध भारतीय कहे जाने वाले कबड्डी और खो-खो जैसे खेलों की राह पर चल पड़े हैं।
कोच्चि की एक गैर-सरकारी संस्था सिनर्जियंस से जुड़े सिजिन आर कहते हैं, "गोटी या पत्थरों के खेल में बच्चे अपनी आंखों, हाथ और निशाने के बीच तालमेल बैठाने की कोशिश करते हैं। निशाने को हिलाने के लिए लाइन और लेंग्थ की जरूरत होती है। लंबे अर्से में ये चीजें फैसले लेने की काबिलियत और प्रबंधन के गुर सीखने में मदद देती हैं।"
पारंपरिक भारतीय खेल
सिनर्जियंस पारंपरिक खेलों को बढ़ावा देने के लिए पूर्व क्रिकेटर अनिल कुंबले की स्पोर्ट्स मैनेजमेंट कंपनी 'टेनविक' के साथ भी काम कर रही है।
टेनविक से जुड़े रवि कुमार कहते हैं, "हमने अपने दस सहयोगी स्कूलों में इन पारंपरिक खेलों की शुरुआत की है। प्राइमरी से निचली क्लासों के छोटे बच्चों को ये खेल सिखाने के लिए हर हफ्ते 40 मिनट की दो क्लासेज दी जाती हैं।"
"इससे उन्हें बुनियादी चीजें सीखने में मदद मिलती है। जब वे तीसरी क्लास में जाएंगे तो वे आधुनिक खेलों में भाग ले सकते हैं।"
खेल में गणित
रेडक्लिफ़ स्कूल के प्रिंसिपल बृंदा रमेश इन पारंपरिक खेलों की शुरुआत को लेकर बहुत उत्साहित हैं। वे कहती हैं, "बच्चे इन खेलों में बहुत मन से भाग लेते हैं। वे बाहर की खुली हवा को महसूस करना चाहते हैं और ऐसा नहीं लगता कि इस उम्र में उन्हें हॉकी या क्रिकेट जैसे खेलों को लेकर कोई बहुत दिलचस्पी होती है।"
बृंदा की योजना आगे चलकर स्तापू के खेल में गणित और अन्य खेलों में पढ़ाई-लिखाई की कुछ अन्य चीजें जोड़ने की है। रवि कुमार बताते हैं, "उदाहरण के लिए लागोरी पकड़ने, फेंकने और निशाना लगाने के लिहाज से बहुत उपयोगी है। क्रिकेट या किसी अन्य आधुनिक खेल में भी यह महत्वपूर्ण है।"
2013 में सिजिन ने जब एक बड़ी कंपनी की ह्यूमन रिसोर्स मैनेजर की नौकरी छोड़कर पारंपरिक खेलों के लिए काम करना शुरू किया था तो उनके साथ बहुत कम लोग आए।
जमीन पर गोटी खेलना मुमकिन न था
लेकिन जब उन्होंने एक बड़े होटल में इसको लेकर एक कार्यक्रम रखा तो सिनर्जियंस को 43 प्रस्ताव मिले। इस बरस ये आंकड़ा बढ़कर 115 हो गया है।
सिजिन बताते हैं, "मेरे पास आने वाले ज्यादातर लोग 40 से 50 साल की उम्र के थे। उनमें से कुछ के लिए तो जमीन पर गोटी खेलना मुमकिन न था क्योंकि इसे पारंपरिक तौर पर ही खेला जाता है। इसलिए हमने उनके लिए टेबल पर ही एक तरह का गोल्फ़ कोर्स रच डाला।"
लेकिन इस बरस कबड्डी को मिली कॉरपोरेट स्पॉन्सरशिप अभी गोटी, स्तापू और लागोरी जैसे खेलों के लिए दूर की कौड़ी है।
जल्द वापसी
सिजिन का कहना है, "हमें अभी तक कोई स्पॉन्सरशिप नहीं मिली है। नेटवर्किंग के अवसरों के लिहाज से इन खेलों में बहुत मौका है। हमें कोच्चि की तरह दिल्ली, महाराष्ट्र और बिहार में प्रतिस्पर्द्धाएँ आयोजित करने की पेशकश भी मिली है।"
जाने माने खेल कमेंटेटर और अभी हाल में ही आयोजित किए गए कबड्डी टूर्नामेंट के आयोजकों में से एक चारु शर्मा को पारंपरिक खेलों से बहुत उम्मीदें हैं।
वे कहते हैं, "पारंपरिक भारतीय खेल जल्द ही वापसी करेंगे। यह बस वक्त की बात है। जो कबड्डी के साथ हुआ, वह दूसरे खेलों के साथ भी होगा।"