{"_id":"0c955ecc-d1ff-11e2-8462-d4ae52bc57c2","slug":"now-rss-want-disengagement-from-lk-advani","type":"story","status":"publish","title_hn":"अब आडवाणी से मुक्ति चाहता है संघ","category":{"title":"India News Archives","title_hn":"इंडिया न्यूज़ आर्काइव","slug":"india-news-archives"}}
अब आडवाणी से मुक्ति चाहता है संघ
नई दिल्ली/हरीश लखेड़ा
Updated Tue, 11 Jun 2013 12:23 AM IST
विज्ञापन
खबरें लगातार पढ़ने के लिए अमर उजाला एप डाउनलोड करें
या
वेबसाइट पर पढ़ना जारी रखने के लिए वीडियो विज्ञापन देखें
अगर आपके पास प्रीमियम मेंबरशिप है तो
भाजपा भले ही अपने रूठे ‘पितामह’ को मनाने में जुटी हो, लेकिन राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ अब लालकृष्ण आडवाणी से मुक्ति चाहता है।
विज्ञापन
संघ का मानना है कि यदि आडवाणी नहीं मानते हैं तो उन्हें उनके हाल पर छोड़कर भाजपा को अब आगे बढ़ लेना चाहिए।
संघ के सह सरकार्यवाह सुरेश सोनी के कहने पर ही भाजपा ने गोवा सम्मेलन में नरेंद्र मोदी को लेकर फैसला किया, जबकि पार्टी का एक बड़ा तबका चाहता था कि यह घोषणा आडवाणी की मौजूदगी में हो।
संघ ने साफ कह दिया है कि आडवाणी के इस कदम से भाजपा को जो नुकसान होना था, वह हो चुका। अब उसकी भरपाई नहीं हो सकती है। ऐसे में पार्टी को अब उन्हें मनाने के लिए ज्यादा मशक्कत नहीं करनी चाहिए।
विज्ञापन
सूत्रों का कहना है कि संघ ने पिछले दिनों कह दिया था कि आडवाणी से लेकर डॉ. मुरली मनोहर जोशी समेत उन सभी बुजुर्ग नेताओं को चुनावी राजनीति से हट जाना चाहिए जिनकी उम्र 70 साल पूरी हो चुकी है।
विज्ञापन
इस पर आडवाणी ने संघ से कह दिया कि वे अभी स्वस्थ हैं और उनके राजनीति में रहने के लिए उम्र को बाधा नहीं बनाया जाना चाहिए। संघ चाहता है कि आडवाणी जैसे वरिष्ठ नेताओं को अब संरक्षक की भूमिका में आ जाना चाहिए।
दरअसल, संघ और आडवाणी के बीच लंबे समय से सांप-सीढ़ी का खेल चल रहा है। नितिन गडकरी की दोबारा ताजपोशी को रुकवाने में आडवाणी की भूमिका को संघ नहीं भूला है।
गडकरी ऐसे पहले भाजपा अध्यक्ष थे जो सीधे दस जनपथ यानी सोनिया गांधी पर हमला करते रहे हैं, संघ भी यही चाहता रहा है। जबकि भाजपा के बाकी नेता ऐसा करने से कतराते रहे हैं।
इससे पहले जिन्ना प्रकरण से नाराज संघ का मानना है कि राममंदिर के पुरोधा आडवाणी वैचारिक तौर पर भी पलट गए। राममंदिर मामले में भी वे पहले जैसे नहीं रहे।
यही वजह है कि विश्व हिंदू परिषद प्रमुख अशोक सिंघल और आडवाणी के बीच दोबारा मधुर संबंध नहीं बन पाए हैं।
आडवाणी के गृह मंत्री रहते हुए त्रिपुरा में मारे गए चार संघ प्रचारकों के हत्याकांड से भी वे ठीक से नहीं निपट पाए। संघ इसे भी भूल नहीं पाया है।
संघ और भाजपा में लगभग एक दशक से बहस जारी है कि नए लोगों को आगे लाया जाना चाहिए। संघ प्रमुख रहते हुए केसी सुदर्शन ने जब ऐसा कहा था तो भाजपा में भारी बवाल मचा था।
जिन्ना प्रकरण के बाद से ही संघ चाहता था कि आडवाणी चुनाव न लड़ें, लेकिन उन्होंने चुनाव लड़ने के साथ ही 2009 के लोकसभा चुनाव में खुद को एनडीए का प्रधानमंत्री पद का उम्मीदवार भी घोषित करवा दिया और अब भी रेस में बने रहना चाहते हैं।