लोकायुक्त पर हो रहे खर्च को लेकर दाखिल याचिका पर यूपी सरकार को नोटिस
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अदालत द्वारा तय तारीख के बाद भी जस्टिस एन के मेहरोत्रा के उत्तर प्रदेश के लोकायुक्त पद पर काबिज रहने के कारण उनके ऊपर हो रहे सरकारी खर्च की वसूली राज्य के मुख्य सचिव से करने की गुहार संबंधी याचिका पर सुप्रीम कोर्ट ने यूपी सरकार को नोटिस जारी किया है।
न्यायमूर्ति रंजन गोगई की अध्यक्षता वाली पीठ ने इस बात पर आश्चर्य व्यक्त किया कि एनके महरोत्रा अब भी लोकायुक्त के पद पर बने हुए हैं।
पीठ ने याचिकाकर्ता से पूछा कि क्या जस्टिस महरोत्रा अब भी लोकायुक्त केपद पर काबिज हैं। पीठ ने राज्य सरकार को चार हफ्ते में जवाब दाखिल करने को कहा है।
खर्चों की हो वसूली
याचिका महेन्द्र कुमार जैन द्वारा दाखिल की गई है।वकील शिव कुमार त्रिपाठी माध्यम से दाखिल याचिका में कहा गया है कि सुप्रीम कोर्ट ने 23 अक्टूबर 2014 तक नए लोकायुक्त बनाने का निर्देश दिया था। लेकिन जस्टिस महरोत्रा अब भी लोकायुक्त के पद पर बने हुए हैं।
लिहाजा 23 अक्टूबर के बाद लोकायुक्त द्वारा दिए गए तमाम निर्णयों को गैरकानूनी और शून्य करार दिया जाए। याचिका में कहा गया है कि इसके लिए राज्य के मुख्य सचिव आलोक रंजन को अदालत की अवमानना को दोषी ठहराया जाए।
याचिका में राज्य सरकार को निर्देश देने की गुहार की गई है कि तय अवधि केबाद जस्टिस महरोत्रा के पद पर बने रहने के कारण उन पर हो रहे वेतन सहित अन्य खर्च की वसूली मुख्य सचिव से की जाए। (फाईल फोटो)
2012 में ही खत्म हो गया था कार्यकाल
साथ ही याचिका में यह भी कहा गया है कि जस्टिस महरोत्रा को तत्काल इस पद से हटाया जाए। सुप्रीम कोर्ट ने गत वर्ष 24 अप्रैल को आदेश दिया था कि छह महीने में लोकायुक्त और उपलोकायुक्त की नियुक्ति की प्रक्रिया पूरी हो जानी चाहिए।
यह समय सीमा गत वर्ष 24 अक्टूबर को समाप्त हो गई। मालूम हो कि जस्टिस एनकेमहरोत्रा को 16 मार्च 2006 को लोकायुक्त नियुक्त किया गया था। उत्तर प्रदेश लोकायुक्त और उप लोकायुक्त अधिनियम, 1975 के तहत लोकायुक्त का कार्यकाल छह साल का था।
15 मार्च 2012 को उनका कार्यकाल खत्म हो गया लेकिन वह पद पर बने रहें। हालांकि 22 मार्च 2012 को उत्तर प्रदेश सरकार अध्यादेश लाकर अधिनियम में संशोधन कर दिया। इसकेतहत लोकायुक्त का कार्यकाल छह साल से बढ़ाकर आठ साल कर दिया गया था।