'छेड़छाड़ थी आम बात, अंधेरे में कैंपस नहीं रहता था सुरक्षित'
मैं उन गिनी-चुनी लड़कियों में थी, जो लाइब्रेरी का इस्तेमाल करती थीं। मुझे इस बात पर हैरानी होती थी कि लड़कियाँ लाइब्रेरी का इतना कम इस्तेमाल क्यों करती हैं? मैं सोचती थी कि शायद वो लड़कों के साथ बैठकर पढ़ने में असहज महसूस करती हैं।
विश्वविद्यालय में काफ़ी विभिन्नता थी। हालांकि, लड़कियों के संग छेड़छाड़ और फ़िकरे कसना आम बात थी। भारत के किसी भी कोने में रहने वाली लड़कियों-महिलाओं को इसे बर्दाश्त करना सीखना होता है, क्योंकि यह भारतीय मर्दों की आम आदत है।
हॉस्टल में आने का समय
एएमयू में मास्टर्स कक्षाओं के हॉस्टल में एक नियत समय पर वापस आकर रिपोर्ट करना होता था। आज जब मैं उस दौर के बारे में सोचती हूँ तो महसूस करती हूँ अगर ऐसी पाबंदी न भी होती तो भी अंधेरा होने से पहले मैं वापस आना ही पसंद करती, क्योंकि अंधेरा होने के बाद कैम्पस एक असुरक्षित जगह लगने लगता था।
अब मैं जवाहरलाल नेहरू विश्वविद्यालय (जेएनयू) में पढ़ती हूँ। यहाँ रहने के बाद मैं जेएनयू और यहाँ जेंडर के प्रति लोगों को संवेदनशील बनाकर और महिला सशक्तिकरण के माध्यम से महिलाओं को सुरक्षा देने की क़ीमत समझ पाई।
मुझे उम्मीद है कि एक दिन एएमयू बेगम सुल्तान जहाँ को अलीगढ़ विश्वविद्यालय का पहला चांसलर बनाए जाने का महत्व समझ पाएगा। बेगम सुल्तान जहाँ, न केवल एएमयू की, बल्कि किसी भी भारतीय विश्वविद्यालय की पहली महिला चांसलर थीं। मुझे उम्मीद है कि एएमयू अपनी विरासत को बनाए रखेगा।
डर और रोमांच दोनों था
मैंने अलीगढ़ मुस्लिम विश्वविद्यालय (एएमयू) के एमए कोर्स में साल 2010 में प्रवेश लिया था और अपने विषय के तौर पर राजनीति विज्ञान को चुना। मेरे लिए यह फ़ैसला करना आसान नहीं था। अपने माता-पिता को इसके लिए राज़ी करना बहुत मुश्किल काम था, वो भी तब जब मैं ख़ुद विश्वविद्यालय को लेकर बहुत आश्वस्त नहीं थी।
मैं कश्मीरी हूँ, मुस्लिम बहुल इलाक़े में पली-बढ़ी हूँ, इसलिए मुस्लिम विश्वविद्यालय में पढ़ने-रहने का चुनाव बहुत हैरान करने वाला नहीं था। मैं सिख हूँ, जो कश्मीर में अल्पसंख्यक हैं, लेकिन महत्वपूर्ण समुदाय है। घर से दूर रहने की कल्पना में थोड़ा डर था तो थोड़ा रोमांच भी और मैं इसका अनुभव लेना चाहती थी।
पहला दिन
एएमयू में मेरा पहला दिन काफ़ी मुश्किल था। यहाँ मैं बहुत सी नई और अनजान चीज़ों का सामना कर रही थी। धीरे-धीरे मैं यहाँ सहज हो गई। यहाँ की विभिन्नता से मैं ख़ुश थी। मेरे लिए ये एक तरह से नई दुनिया देखने जैसा था। यहाँ आए मुझे क़रीब एक महीना ही हुआ था, लेकिन इस बात का अहसास होने लगा कि मुझमें लोगों को कुछ ख़ास रुचि है।
मुझसे तरह-तरह के सवाल के पूछे गए। मैं कौन हूँ और कहाँ से आई हूँ, इसके बारे में तमाम क़यास लगाए गए। कुछ लोगों को भ्रम हुआ कि मैं कश्मीरी मुस्लिम हूँ। उसके बाद मुझे अहसास हुआ कि बाहरी दुनिया कश्मीरी सिखों की पहचान से अनजान है।
घरवालों की जिज्ञासा
मेरे घर पर भी लोगों में काफ़ी जिज्ञासा थी। मुझसे कई तरह के सवाल पूछे जाते थे, जैसे कि क्या मैं मुस्लिम विश्वविद्यालय में जींस पहन पाती हूँ? क्या मुझे हर समय अपने सिर को ढक कर रखना पड़ता है? क्या वहाँ ग़ैर-मुस्लिमों के साथ रूखा बर्ताव किया जाता है?
मुझे महसूस होने लगा कि दुनिया पूर्वाग्रहों पर चल रही है, क्योंकि मुस्लिम विश्वविद्यालय है, इसलिए मान लिया गया कि मुझे वो सब करना पड़ेगा, जो मुस्लिमों को करना पड़ता है।
पहले मैं घर और विश्वविद्यालय दोनों जगह लोगों को समझाती रहती थी कि मैं विश्वविद्यालय में जो चाहे वो कर सकती हूँ या फिर कश्मीर घाटी में काफ़ी सिख हैं और इस बात पर उन्हें हैरान नहीं होना चाहिए, लेकिन समय बीतने के साथ मैंने सफाई देनी बंद कर दी।
जब मेरे कुछ दोस्त बन गए तो मैंने आसपास के इलाक़े की ख़ूबसूरती का जायज़ा लेना शुरू किया। मेरा विभाग कला संकाय में मौलाना आज़ाद लाइब्रेरी के सामने था। यह मेरी तब तक की देखी गई सबसे समृद्ध लाइब्रेरी थी।