'नरेंद्र मोदी की नजर में गंगा से बढ़कर हैं नौकरशाह'
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प्रख्यात पर्यावरणविद प्रोफेसर ज्ञान स्वरूप सानंद गंगा की अविरलता-निर्मलता के बहुप्रतीक्षित एजेंडे पर नरेंद्र मोदी सरकार के अब तक के कामकाज से बेहद नाराज हैं।
सानंद की मानें तो पीएम मोदी ने अपने पहले अध्यादेश के जरिए देश को यह एहसास करा दिया है कि उनकी नजर में गंगा से बढ़कर नौकरशाह नृपेंद्र मिश्र हैं। जिस तरह शपथ लेने से पहले काशी के दशाश्वमेध घाट पर उन्होंने गंगा के प्रति अपने संकल्पों को दोहराया था, उस पर वे अमल करते तो सबसे पहले प्रमुख सचिव की नियुक्ति के लिए नहीं बल्कि संसद में गंगा की मुक्ति के लिए ही अध्यादेश लाया जाता। हो सकता है कि यूपीए सरकार की तरह सिर्फ गंगा-गंगा जपने की बजाए यह सरकार गंगा के पहले ‘मां’ और बाद में ‘जी’ लगाकर सिर्फ दिखावे की माला जपती रह जाए।
महमूरगंज स्थित गंगा महासभा के कार्यालय में अमर उजाला से विशेष मुलाकात में सानंद ने गंगा के प्रति बरती जा रही उदासीनता की परतें एक-एक कर खोलने की कोशिश की। सानंद देश के अन्य ज्वलंत मुद्दों, समस्याओं या सहायक नदियों के मसले को गंगा के आगे तुच्छ मानते हैं। उनका कहना है कि बात सिर्फ गंगा पर ही होनी चाहिए, इसके अलावा कुछ भी वे कहना-सुनना नहीं चाहते।
प्रोफेसर सानंद की उम्मीदों पर खरे नहीं उतरे मोदी
सानंद को उम्मीद थी कि मोदी सरकार सत्ता संभालने के 10 दिन के भीतर ही गंगा की रक्षा के लिए कोई ठोस फैसला ले लेगी लेकिन दो महीने बीतने के बाद दिखावे का ‘गंगा मंथन’ करने के अलावा कुछ नहीं हो सका। गंगा की अविरलता-निर्मलता के सवाल पर गठित समितियों की रिपोर्ट पर कार्रवाई करना तो दूर राष्ट्रीय गंगा नदी बेसिन प्राधिकरण को न तो भंग किया गया और न तो उसके पुनर्गठन का ही निर्णय लिया जा सका। अगर ऐसा नहीं हुआ तो पीएम को नियमानुसार तत्काल एनजीआरबीए की बैठक बुलानी चाहिए थी लेकिन यह भी नहीं हो सका। इससे देश भर में गंगा के लिए लंबे समय से संघर्ष करने वालों को बेहद निराशा हुई है।
सानंद चाहते हैं कि केंद्र सरकार शीघ्र गंगा में पर्यावरणीय प्रवाह तय करने के साथ ही प्रस्तावित और निर्माणीधीन बांधों को रद कर दे, ताकि इस जीवन धारा को नैसर्गिक रूप में लाने की दिशा में कदम बढ़ाया जा सके।
गंगा पर लंबे संघर्ष के लिए प्रसिद्ध प्रोफेसर ज्ञान स्वरूप सानंद ने हाल में ही दिल्ली में हुए ‘गंगा मंथन’ को मिलने-जुलने और खाने-पीने का एक समारोह करार दिया। उन्होंने कहा कि यह सिर्फ नाम का मंथन था। गंगा मुक्ति के सरोकारों से इसका कोई नाता नहीं था। वरना यूं ही मिलने और खाने तक यह न सिमट जाता। केंद्रीय जल संसाधन और गंगा पुनरुद्धार मंत्रालय की ओर से बुलाए गए इस मंथन में सानंद शामिल नहीं हुए थे।