फ्री ई-पेपर
पर्सनलाइज़्ड फ़ीड
पर्सनलाइज़्ड नोटिफ़िकेशन
चलते-फिरते ख़बरें
लॉयल्टी रिवॉर्ड्स
डाउनलोड करें

सब्सक्राइब करें
Hindi News ›   News Archives ›   India News Archives ›   no expectation from narendra modi on ganga agenda

'नरेंद्र मोदी की नजर में गंगा से बढ़कर हैं नौकरशाह'

Fri, 18 Jul 2014 01:57 AM IST
अनूप ओझा/अमर उजाला, वाराणसी
अनूप ओझा/अमर उजाला, वाराणसी Updated Fri, 18 Jul 2014 01:57 AM IST
विज्ञापन
no expectation from narendra modi on ganga agenda

प्रख्यात पर्यावरणविद प्रोफेसर ज्ञान स्वरूप सानंद गंगा की अविरलता-निर्मलता के बहुप्रतीक्षित एजेंडे पर नरेंद्र मोदी सरकार के अब तक के कामकाज से बेहद नाराज हैं।

विज्ञापन


सानंद की मानें तो पीएम मोदी ने अपने पहले अध्यादेश के जरिए देश को यह एहसास करा दिया है कि उनकी नजर में गंगा से बढ़कर नौकरशाह नृपेंद्र मिश्र हैं। जिस तरह शपथ लेने से पहले काशी के दशाश्वमेध घाट पर उन्होंने गंगा के प्रति अपने संकल्पों को दोहराया था, उस पर वे अमल करते तो सबसे पहले प्रमुख सचिव की नियुक्ति के लिए नहीं बल्कि संसद में गंगा की मुक्ति के लिए ही अध्यादेश लाया जाता। हो सकता है कि यूपीए सरकार की तरह सिर्फ गंगा-गंगा जपने की बजाए यह सरकार गंगा के पहले ‘मां’ और बाद में ‘जी’ लगाकर सिर्फ दिखावे की माला जपती रह जाए।
विज्ञापन


महमूरगंज स्थित गंगा महासभा के कार्यालय में अमर उजाला से विशेष मुलाकात में सानंद ने गंगा के प्रति बरती जा रही उदासीनता की परतें एक-एक कर खोलने की कोशिश की। सानंद देश के अन्य ज्वलंत मुद्दों, समस्याओं या सहायक नदियों के मसले को गंगा के आगे तुच्छ मानते हैं। उनका कहना है कि बात सिर्फ गंगा पर ही होनी चाहिए, इसके अलावा कुछ भी वे कहना-सुनना नहीं चाहते।
विज्ञापन
विज्ञापन

प्रोफेसर सानंद की उम्मीदों पर खरे नहीं उतरे मोदी

no expectation from narendra modi on ganga agenda

सानंद को उम्मीद थी कि मोदी सरकार सत्ता संभालने के 10 दिन के भीतर ही गंगा की रक्षा के लिए कोई ठोस फैसला ले लेगी लेकिन दो महीने बीतने के बाद दिखावे का ‘गंगा मंथन’ करने के अलावा कुछ नहीं हो सका। गंगा की अविरलता-निर्मलता के सवाल पर गठित समितियों की रिपोर्ट पर कार्रवाई करना तो दूर राष्ट्रीय गंगा नदी बेसिन प्राधिकरण को न तो भंग किया गया और न तो उसके पुनर्गठन का ही निर्णय लिया जा सका। अगर ऐसा नहीं हुआ तो पीएम को नियमानुसार तत्काल एनजीआरबीए की बैठक बुलानी चाहिए थी लेकिन यह भी नहीं हो सका। इससे देश भर में गंगा के लिए लंबे समय से संघर्ष करने वालों को बेहद निराशा हुई है।

सानंद चाहते हैं कि केंद्र सरकार शीघ्र गंगा में पर्यावरणीय प्रवाह तय करने के साथ ही प्रस्तावित और निर्माणीधीन बांधों को रद कर दे, ताकि इस जीवन धारा को नैसर्गिक रूप में लाने की दिशा में कदम बढ़ाया जा सके।

गंगा पर लंबे संघर्ष के लिए प्रसिद्ध प्रोफेसर ज्ञान स्वरूप सानंद ने हाल में ही दिल्ली में हुए ‘गंगा मंथन’ को मिलने-जुलने और खाने-पीने का एक समारोह करार दिया। उन्होंने कहा कि यह सिर्फ नाम का मंथन था। गंगा मुक्ति के सरोकारों से इसका कोई नाता नहीं था। वरना यूं ही मिलने और खाने तक यह न सिमट जाता। केंद्रीय जल संसाधन और गंगा पुनरुद्धार मंत्रालय की ओर से बुलाए गए इस मंथन में सानंद शामिल नहीं हुए थे।

विज्ञापन
विज्ञापन
विज्ञापन
विज्ञापन
विज्ञापन

एड फ्री अनुभव के लिए अमर उजाला प्रीमियम सब्सक्राइब करें

Next Article

AU ऐप में पढ़ें

Followed