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आठ साल बाद भी अन्ना की ईमानदारी पर फैसला नहीं
नई दिल्ली/ब्यूरो
Updated Fri, 01 Mar 2013 07:53 PM IST
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समाजसेवी अन्ना हजारे के एनजीओ हिंद स्वराज ट्रस्ट पर लगे कथित अनियमितताएं के आरोपों पर महाराष्ट्र सरकार अभी भी विचार कर रही है। राज्य सरकार ने शुक्रवार को सर्वोच्च अदालत से कहा है कि जस्टिस पी. बी. सावंत आयोग की जांच रिपोर्ट पर कोई फैसला नहीं लिया गया है। रिपोर्ट सरकार के पास विचाराधीन है। आठ साल पहले आयोग ने मार्च 2005 में रिपोर्ट राज्य विधानसभा में पेश की थी।
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महाराष्ट्र सरकार के प्रशासनिक विभाग के संयुक्त सचिव ने इस मसले पर सर्वोच्च अदालत में हलफनामा दायर किया है। अदालत ने गत वर्ष 17 अक्तूबर को अधिवक्ता मनोहर लाल शर्मा की ओर से दायर याचिका पर केंद्र, महाराष्ट्र और सीबीआई को नोटिस जारी किया था।
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हलफनामे में राज्य सरकार ने आयोग की रिपोर्ट को भी शामिल किया गया है। याद रहे कि इस आयोग ने अन्ना हजारे के चार एनजीओ की जांच की थी और अपनी रिपोर्ट में इन एनजीओ की ओर से तमाम अनियमितताएं बरते जाने का खुलासा भी किया था। हलफनामे में सरकार ने हजारे के ट्रस्ट को क्लीन चिट न देते हुए यह स्पष्ट किया है कि आयोग की रिपोर्ट विचाराधीन है।
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राज्य सरकार ने हलफनामे में कहा है कि सितंबर, 03 में जस्टिस सावंत के नेतृत्व में जांच आयोग का गठन उस शिकायत पर किया था जिसमें चार मंत्रियों पर तमाम आरोप लगाए गए थे। इसके साथ ही हजारे के ट्रस्ट पर अनियमितता बरतने के आरोप लगे थे।
आयोग ने फरवरी, 2005 में जांच पूरी कर अपनी रिपोर्ट मार्च में राज्य विधानसभा में पेश कर दी थी। इसके बाद सरकार ने 25 अप्रैल में एक अधिसूचना जारी कर एक टास्क फोर्स का गठन किया जिसे रिपोर्ट पर सलाह देनी थी।
टास्क फोर्स ने भी रिपोर्ट पर अपनी राय दिसंबर, 2005 में पेश कर दी। इस दौरान हजारे ने सरकार से विधि विशेषज्ञों की तीन सदस्यीय समिति गठित करने की मांग की जिसमें एक सदस्य उनके पक्ष को पेश करने की गुजारिश भी थी।
हलफनामे के मुताबिक सरकार ने जनवरी, 2006 में राज्य के महाधिवक्ता और दो वरिष्ठ अधिवक्ताओं की समिति गठित कर दी। इसी दौरान टास्क फोर्स के गठन को हाईकोर्ट में चुनौती दे दी गई। हाईकोर्ट ने टास्क फोर्स की राय पर विचार करने से रोक लगा दी। साथ ही महाधिवक्ता के नेतृत्व वाली तीन सदस्यीय समिति को भी टास्क फोर्स की सलाहों को रिकॉर्ड में लिए जाने से मना कर दिया।
हालांकि महाधिवक्ता सहित तीनों अधिवक्ताओं को आयोग की रिपोर्ट के निष्कर्ष पर कार्रवाई की प्रकृति को लेकर सलाह देने की छूट प्रदान की। महाधिवक्ता की ओर से कानूनी सलाह राज्य सरकार के समक्ष पेश की जा चुकी है और अब आयोग की रिपोर्ट अब सरकार के समक्ष विचाराधीन है।