इस्तीफा देकर दांव खेल गए नीतीश
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लोकसभा चुनाव में करारी हार की नैतिक जिम्मेदारी लेते हुए बिहार के मुख्यमंत्री नीतीश कुमार ने अचानक इस्तीफा देकर सभी को चौंका दिया है।
हालांकि नैतिकता के बहाने कुर्सी छोड़ने का नीतीश का यह फैसला बड़ा राजनीतिक मास्टर स्ट्रोक माना जा रहा है।
इस्तीफे का फैसला उन्होंने राज्य की राजनीति में भाजपा की भारी बढ़त और राजद को कमजोर बनाने की रणनीति के तहत लिया है।
हकीकत से वाकिफ थे नीतीश
दरअसल नीतीश को लगता है कि उनके इस फैसले से केंद्र की राजनीति में भाजपा के उभार से चिंतित मुस्लिम बिरादरी जहां विधानसभा चुनाव में उन्हें थोक में वोट देगी।
वहीं, भाजपा के स्थानीय नेतृत्व को एक सर्वमान्य चेहरा तलाशने में भी दिक्कत हो सकती है।
वैसे भी नीतीश को यह अच्छी तरह पता था कि बेहद विपरीत राजनीतिक परिस्थितियों में वह अपनी अल्पमत सरकार की गाड़ी जितनी लंबी खींचने की कोशिश करते, उनकी सरकार की साख को उतना ही बट्टा लगता।
जमीन तलाशने में जुटी JD(U)
हालांकि यह भी बड़ी सच्चाई है कि चूंकि अब वहां विधानसभा को भंग कर चुनाव कराने का निर्णय केंद्र की नई सरकार को करना है।
लोकसभा चुनाव से पहले और चुनाव के दौरान अपने करीब आधा दर्जन विधायक को निलंबित कर नीतीश की सरकार अल्पमत में आ गई थी।
करारी हार के बाद जहां जदयू में नीतीश के खिलाफ मोर्चा खुलने की मजबूत जमीन तैयार हो रही थी, वहीं उनकी सरकार पूरी तरह से कांग्रेस और निर्दलीय विधायकों के समर्थन के रहमोकरम पर टिकी थी।
शुक्रवार को ही ले लिया था फैसला
विरोध की जमीन तैयार होने का अंदाजा इसी से लगाया जा सकता है कि नतीजे आने के बाद बुलाई गई कैबिनेट की बैठक में आधे मंत्रियों ने शिरकत करना तक जरूरी नहीं समझा।
नीतीश पर मंत्रिमंडल विस्तार का दबाव भी पड़ने लगा तो दूसरी ओर उनके पास जदयू विधायकों के पाला बदलने की भी पुख्ता सूचना आई।
इसके बाद नीतीश को लगा कि अगर मंत्री पद को रेबड़ियों की तरह बांटा गया तो पहले से लड़खड़ा चुकी सरकार की साख भी जाते देर नहीं लगेगी। जदयू सूत्रों का कहना है कि इसके बाद ही नीतीश ने बीते शुक्रवार की रात ही इस्तीफा देने का निर्णय किया।