नरेंद्र मोदी ने बिहार में किया दो दुश्मनों को एक
संकट में सांप और चूहे की एक ही नाव पर सवारी संबंधी कहावत बिहार की राजनीति में चरितार्थ होती दिख रही है।
आम चुनाव में मोदी लहर में करीब-करीब सूपड़ा साफ हो जाने के बाद भावी संकट को भांपते हुए राज्य में एक दूसरे के विरोध की राजनीति करने वाले दो दिग्गजों नीतीश कुमार और लालू प्रसाद ने हाथ मिला लिए हैं।
मोदी ने मिलाया पुराने साथियों को
इसे जदयू अध्यक्ष शरद यादव की मोदी के विरोध में राज्य में पुराने समाजवादियों को एकजुट करने की मुहिम की ठोस शुरुआत के रूप में देखा जा रहा है। माना जा रहा है कि ये दोनों दल अगले साल होने वाले विधानसभा चुनाव साथ मिल कर लड़ने की योजना पर भी विचार कर रहे हैं।
हालांकि सोनिया गांधी से मुलाकात के बाद लालू ने फिलहाल इससे इनकार किया है। राजद की नीतीश के इस्तीफे के बाद गठित मांझी सरकार को समर्थन से शुरू हुई नई दोस्ती को मजबूती देने के लिए दोनों दल राज्यसभा उपचुनाव में भी हाथ मिला सकते हैं।
राबड़ी देवी जाएंगी राज्यसभा
खासतौर पर राजद सुप्रीमो लालू प्रसाद की योजना इस नई दोस्ती के सहारे अपनी पत्नी राबड़ी देवी को राज्यसभा भेजने की है। राज्य में जल्द ही राज्यसभा की तीन सीटों के लिए उपचुनाव होने हैं।
लोकसभा चुनाव जीतने के कारण राज्यसभा के सदस्य राजीव प्रताप रूडी, रामकृपाल यादव और रामविलास पासवान को इस्तीफा देना होगा। उपचुनाव में अगर भाजपा विरोधी दलों ने हाथ मिलाया तो उन्हें दो सीटें हासिल हो सकती हैं।
नीतीश या शरद पहुंचेगा उच्च सदन
माना जा रहा है कि जदयू इनमें से एक सीट राजद को नई दोस्ती के तोहफे के रूप में देगा। जबकि दूसरी सीट से खुद नीतीश या शरद या जदयू का कोई अन्य उम्मीदवार उच्च सदन पहुंचेगा।
कुछ जानकार इस समझौते को एक बड़ी राजनीतिक लड़ाई की शुरुआत बता रहे हैं तो कुछ इसे चुनाव में भाजपा के साथ गए सवर्ण वोटों के खिलाफ जदयू-राजद की महज मिश्रित लामबंदी मानते हैं।
सांप्रदायिकता के नाम पर एक हुए विरोधी
पुराने जनता दल के नेताओं के बीच समझौते पर लालू का कहना है कि समन्वय की जिम्मेदारी सबकी है। मंडल वालों पर हमला हो रहा है, ऐसे में एकजुटता समय की मांग है।
वैसे हमारा सांप्रदायिक शक्तियों के खिलाफ संघर्ष जारी रहेगा। राजनीतिक विश्लेषक अनंत कुमार का कहना है कि यह राजनीति बिहार से ही शुरू हो सकती है।