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नितिन गडकरी बनेंगे महाराष्ट्र का नया चेहरा

Sun, 18 May 2014 07:24 PM IST
Updated Sun, 18 May 2014 07:24 PM IST
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nitin gadkari in news face of maharastra

16वीं लोकसभा में कांग्रेस-एनसीपी के सत्ता से बाहर होने के बाद एनसीपी सुप्रीमो शरद पवार राष्ट्रीय राजनीति से आउट हो गए हैं। भाजपा के पूर्व अध्यक्ष नितिन गडकरी अब राष्ट्रीय राजनीति में महाराष्ट्र का नया चेहरा बनेंगे।

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एनसीपी के संस्थापक अध्यक्ष शरद पवार को पार्टी के  गठन के बाद पहली बार ऐसा झटका लगा है, जब राष्ट्रीय राजनीति में उनकी कोई भूमिका नहीं रहेगी।

दिल्ली में वजन बढ़ाने के लिए शरद पवार ने महाराष्ट्र में 10 से 12 सीट जीतने का लक्ष्य निर्धारित किया था। पर, महज चार सीटों पर ही सिमट कर रह गए, हालांकि बिहार और पूर्वोत्तर राज्य में एक-एक सीट पर जीत से एनसीपी का राष्ट्रीय कद बना रहेगा लेकिन रुतबा नहीं रहेगा।
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एनसीपी के अस्तित्व में आने के बाद यह तीसरा लोकसभा चुनाव था, जिसमें पार्टी दोहरे अंक तक नहीं पहुंच सकी। चुनावी नतीजे घोषित होने के बाद शरद पवार ने कहा कि वह कांग्रेस नीत यूपीए सरकार के साथ बने रहेंगे।
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कांग्रेस की वजह से घटा एनसीपी का कद

nitin gadkari in news face of maharastra

क्या कांग्रेस से चिपके रहना उनकी मजबूरी है? जबकि पवार के राजनीतिक प्रतिद्वंद्वी उन्हें सत्ता के गलियारे में कदमताल करने वाले नेता कहते हैं।

दस साल तक केंद्र की सत्ता में रहे शरद पवार को पूर्व प्रधानमंत्री अटल बिहारी वाजपेयी के समय में भी लालबत्ती मिली थी। तब उन्हें नेशनल डिजास्टर मैनेजमेंट का चेयरमैन बनाया गया था।

इस तरह सरकार से बाहर रहने के बाद भी पवार लालबत्ती से महरूम नहीं रहे। तब भाजपा पूर्ण बहुमत में नहीं थी लेकिन अब स्थिति बदल गई है।

सही गठबंधन से बढ़ा बीजेपी का आधार

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मुंबई में जन्मी कांग्रेस को महाराष्ट्र ने ही नकार दिया। आखिर क्या वजह रही,जिसके चलते कांग्रेस को दो सीट पर ही सिमट जाना पड़ा। राजनीति के जानकारों की मानें तो सबसे पहला कारण जनाधार विहीन नेतृत्व रहा।
 
मुख्यमंत्री पृथ्वीराज चव्हाण ने पार्टी विधायकों और नेताओं की भारी उपेक्षा की। राज्य में निगम, बोर्ड पर पार्टी नेताओं की नियुक्ति नहीं होने की नाराजगी भी एक वजह रही।

दूसरा, प्रदेश कांग्रेस अध्यक्ष माणिकराव ठाकरे और पृथ्वीराज चव्हाण की आपसी गुटबाजी से निराश कार्यकर्ताओं में हताशा फैली। महाराष्ट्र कांग्रेस प्रभारी मोहन प्रकाश ने भी गुटबाजी को हवा दी, जिससे सत्ता और संगठन के बीच दरार बढ़ती गई।

तीसरा, मुंबई सहित राज्य के विकास का ढिंढोरा पीटने वाली कांग्रेस-एनसीपी सरकार ने ऐसा कुछ भी नहीं किया जिससे जनता में सकारात्मक संदेश गया हो।

कांग्रेस ने नहीं किया सही काम

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मुंबई में झोपड़ पट्टी योजना का बंटाधार हो गया तो विकास योजनाएं साल दर साल लटकी रही। छात्रों को छात्रवृत्ति के भी लाले पड़ गए।

लोगों को सिर्फ आश्वासन का झुनझुना थमाया जाता रहा। चौथा, आपसी गुटबाजी और कांग्रेस-एनसीपी के बीच सामंजस्य के अभाव ने चुनाव में पार्टी की लुटिया डुबा दी।

उद्योगमंत्री नारायण राणे के बेटे नीलेश राणे की पराजय में एनसीपी नेताओं ने बड़ी भूमिका निभाई तो कई जगह कांग्रेस ने एनसीपी उम्मीदवारों के लिए काम नहीं किया।

वहीं भाजपा ने शिवसेना के साथ दलित नेता आरपीआई अध्यक्ष रामदास आठवले और किसान नेता राजू शेट्टी सहित राष्ट्रीय समाज पार्टी जैसे क्षेत्रीय संगठन से हाथ मिलाकर गठबंधन को मजबूत बनाया।

इसके मुकाबले कांग्रेस-एनसीपी गठबंधन काफी कमजोर रहा। हर चुनाव में कांग्रेस-एनसीपी दलितों के वोट के लिए नीले झंडे का सहारा लेना पड़ता है लेकिन इस बार नीले झंडे का टोटा पड़ गया था।

शुरुआत से ही चुनाव प्रचार में कांग्रेस का ढीला रवैया रहा। चव्हाण को हालांकि चुनाव में फ्रीहैंड बैटिंग करने का मौका मिला लेकिन उनकी अपील बेअसर रही।

पांचवा, कांग्रेस-एनसीपी न सिर्फ कथित भ्रष्टाचार और घोटालों में आकंठ घिरी रही बल्कि चोरी और सीना जोरी भी करती रही। चूंकि जनता सब जानती है इसलिए कांग्रेस-एनसीपी को महाराष्ट्र से तड़ीपार कर दिया।

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