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कृतिम हीरा तैयार करने का खुला रहस्य!

Mon, 01 Dec 2014 04:05 PM IST
डेविड रॉबसन/फीचर लेखक, बीबीसी फ्यूचर
डेविड रॉबसन/फीचर लेखक, बीबीसी फ्यूचर Updated Mon, 01 Dec 2014 04:05 PM IST
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हमारी धरती जितनी दिलचस्प ऊपर है, उतनी रहस्यमय अंदर से भी है। धरती के पेट में ईंधन और बेशकीमती खनिज और रत्न भरे पड़े हैं। हीरा धरती के अजूबों में से एक है।

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धरती के गर्भ में हीरा बनता कैसे है इस रहस्य से पर्दा उठाने की कोशिश कर रहे हैं वैज्ञानिक डैन फ्रॉस्ट, जर्मनी के बेयरिस्क जियो इंस्टीट्यूट की लेबोरेट्री में।
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लैब में कभी-कभार होने वाले धमाके और अपने ऑफिस के फ्लोर के हिलने जैसी बातों से फ्रोस्ट ज्यादा परेशान नहीं होते, उन्होंने अपनी प्रयोगशाला में पृथ्वी के गहरे गर्भ जैसे हालात पैदा करने की कोशिश की है जिनकी वजह से हीरा बना होगा।
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चट्टानों पर बहुत भारी दबाब डाला जाता है जो इंसानी बूते से बाहर की बात है। ऐसे में कुछ छोटी-मोटी दुर्घटनाओं का होना ताज्जुब की बात नहीं है, अपने इस कार्य के दौरान फ्रोस्ट को हीरा बनाने के कई चौंकाने वाले तरीकों का पता चला है।

इनमें सबसे चौंकाने वाला है भुनी हुई मूंगफली को पीसकर बनाए गए पेस्ट का इस्तेमाल जिसे पीनट बटर कहते हैं। अंतरिक्ष की खोज के क्षेत्र में हमने जितनी तरक्की की है, उसकी तुलना में अपने ही पैर के नीचे दबी दुनिया के बारे में हमारी जानकारी काफी कम है।

फ्रॉस्ट का कहना है, "अगर हमें यह जानना है की पृथ्वी की रचना कैसे हुई तो हमें यह जानना होगा कि यह ग्रह किससे बना है।"

हीरा की आणविक संरचना

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पृथ्वी उसी तरह के पदार्थों से बनी है जिस तरह के पदार्थों से उल्कापिंड बने हैं पर समस्या ये है कि पृथ्वी पर आने वाले अधिकतर उल्कापिंडों में सिलिकन का अनुपात पृथ्वी के अंदरूनी हिस्से में मौजूद सिलिकन से काफी अधिक है।

ऐसे में सवाल उठता है कि शेष सिलिकन कहां चला गया? एक संभावित उत्तर है कि वह पृथ्वी के निचले आवरण में आकर फंस गया।

फ्रॉस्ट ने इस काम के लिए पहले क्रिस्टल को गलाकर ऐसी चीज तैयार की जो कि धरती के भीतर मौजूद खनिज जैसा है, धरती की सतह से 800-900 किलोमीटर नीचे भारी दबाव की वजह से क्रिस्टल की आणविक संरचना बदल जाती है और वह हीरे में तब्दील हो जाता है।

वायुमंडल की तुलना में लाखों गुना अधिक दबाव पैदा करने के लिए उन्होंने एक पिस्टन का प्रयोग किया है जो हीरों से बना है। फ्रॉस्ट ने ध्वनि तरंगों को गुजार कर इस बात की तस्दीक की है कि उनके लैब की स्थितियां धरती के गर्भ जैसी ही हैं जहां हीरा जन्म लेता है।

सीधे-सीधे कहें तो फ्रॉस्ट अपनी प्रयोगशाला में उच्च दबाव की स्थिति पैदा कर वास्तव में कम सघन वायु से हीरा बनाने में सफल रहे। इस बात की संभावना कम है कि अपने इस प्रयोग से फ्रॉस्ट अमीर हो जाएं, इस प्रक्रिया से हीरा बनाने में काफी लंबा समय लगता है।

उनका कहना है, "अगर हमें दो या तीन मिलीमीटर का हीरा चाहिए तो हमें इसके लिए इस प्रयोग को कई सप्ताह तक जारी रखना पड़ेगा।"

हीरा बनाने के अन्य तरीके

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मगर उन्होंने अन्य स्रोतों से हीरा बनाने के खयाल को छोड़ा नहीं है, जर्मनी के एक टीवी स्टेशन के कहने पर उन्होने कार्बन की अधिकता वाले पीनट बटर से कुछ हीरे बनाने की कोशिश की।

उन्होंने कहा, "इस प्रक्रिया में निकले अधिक मात्रा में हाइड्रोजेन ने इस प्रयोग को बर्बाद कर दिया पर इससे पहले हीरा तैयार हो चुका था।" अब फ्रोस्ट का संस्थान विभिन्न गुणों वाले कृत्रिम हीरा बनाने की संभावना तलाश रहा है।

हीरों को बोरॉन से रोगन करने से इलेक्ट्रॉनिक वस्तुओं के लिए शायद बेहतर सेमीकंडक्टर बनाए जा सकते हैं जो इस्तेमाल के दौरान ज्यादा गर्म नहीं होते, बेहतर सेमीकंडक्टर के अभाव में इस समय इलेक्ट्रॉनिक्स के सामानों के प्रयोग में सर्वाधिक ऊर्जा की क्षति होती है।

इसके अलावा, सूक्ष्म नैनो ट्यूब के रूप में कार्बन की अन्य संरचनाओं का कच्चे पदार्थ के रूप में इस्तेमाल करके नए तरह के अत्यंत मजबूत हीरे तैयार किए जा सकते हैं जो कि किसी भी ज्ञात पदार्थ से ज्यादा मजबूत होंगे।

हैरतअंगेज नतीजे

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फ्रॉस्ट के निष्कर्ष हैरत में डालने वाले हैं, अत्यधिक दबाव डालने के कारण एक नई चीज़ सामने आई है जो कि गहरे नीले रंग का मैग्नेशियम आयरन सिलिकेट है और संभवतः पानी को रोके रखता है। यह परिणाम इस बात की ओर संकेत करते हैं कि धरती के गहरे नीचे आवरण में कई “समुद्र” छिपे होंगे।

फ्रॉस्ट का मानना है कि भूगर्भीय हलचलों ने संभवत समुद्र से कार्बन डाइऑक्साइड को खींच कर उसे चट्टानों और बाद में पृथ्वी के आवरण में धकेल दिया होगा जहां वह दबाव की वजह से हीरे में बदल गया होगा। फ्रॉस्ट का कहना है कि कार्बन के अन्य रूपों की तुलना में हीरे कम वाष्पशील होते हैं।

इसका मतलब यह हुआ कि इनके वापस वायुमंडल में मिल जाने की संभावना कम होती है, ऐसा समझा जाता है कि धरती के गर्भ में मौजूद कार्बन डाइ ऑक्साइड ने पृथ्वी के तपने की प्रक्रिया को धीमा किया होगा और उस पर जीवन के विकास में योगदान दिया होगा।

पर फ्रॉस्ट की दिलचस्पी इस बात में है कि उनका प्रयोग पृथ्वी के इतिहास के गुप्त रहस्यों के बारे में कितना बताता है। अगर इस तरह के बड़े प्रयोग कर रहे हैं तो इसके लिए थोड़ा पीनट बटर बर्बाद करने और एक-आध विस्फोटों का जोखिम उठाने से पीछे हटना ठीक नहीं होगा।

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