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नया नक्सली नेता है इस घातक हमले की वजह?

Mon, 27 May 2013 02:26 PM IST
नई दिल्ली/इंटरनेट डेस्क
नई दिल्ली/इंटरनेट डेस्क Updated Mon, 27 May 2013 02:26 PM IST
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new maoist leader may be responsible for deadly attack in chhattisgarh

नक्सली जिस तरह कार्रवाई करते हैं उसमें यह जानना शायद कभी संभव नहीं होगा कि आख़िर छत्तीसगढ़ में राजनीतिज्ञों में अचानक इतना बड़ा हमला क्यों हुआ।

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लेकिन नक्सली मामलों के जानकार कह रहे हैं कि हो सकता है कि इसके पीछे दंडकारण्य इलाक़े में नक्सली संगठन में हुआ नेतृत्व परिवर्तन हो। छत्तीसगढ़ का बस्तर इसी दंडकारण्य इलाक़े के अंतर्गत आता है।
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उनका कहना है कि पिछले दिनों आई इस ख़बर में सत्यता नज़र आती है कि दंडकारण्य का नेतृत्व कोसा की जगह रामन्ना को सौंप दिया गया है।

कोसा धीर-गंभीर व्यक्ति माने जाते हैं और हिंसा को हथियार की तरह इस्तेमाल नहीं करते लेकिन रामन्ना हिंसक कार्रवाइयों के पक्षधर रहे हैं।

आक्रामक कार्रवाई का पक्षधर

रामन्ना यानी रावुलू श्रीनिवास को सीपीआई (माओवादी) पार्टी के दंडकारण्य स्पेशल ज़ोनल कमेटी का प्रभारी बनाए जाने की ख़बरें एक हफ़्ते पहले ही ख़ुफ़िया सूत्रों के हवाले से एक समाचार एजेंसी ने जारी की थी।
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रामन्ना वही नक्सली नेता हैं जिनके नेतृत्व में नक्सलियों ने अप्रैल 2010 में बस्तर के ताड़मेटला में 76 सीआरपीएफ़ जवानों की हत्या की थी।

छत्तीसगढ़ के नक्सलियों पर कई वर्षों के शोध के बाद 'उसका नाम वासु नहीं' नाम की किताब लिख चुके वरिष्ठ पत्रकार शुभ्रांशु चौधरी का कहना है कि रामन्ना हमेशा से आक्रामक कार्रवाइयों के पक्ष में रहे हैं।

 
शुभ्रांशु ने अमर उजाला से हुई बातचीत में कहा कि वे जितनी बार भी रामन्ना से मिले वे हमेशा कोसा की कार्यप्रणाली से असहमत नज़र आए और कई बार उन्होंने इस पर तंज़ भी किया।

कोसा उर्फ़ काटकम सुदर्शन उर्फ़ सत्यनारायण राव अपनी सैद्धांतिक कार्यशैली की वजह से संगठन में हेडमास्टर के नाम से भी जाना जाता रहा है।

जबकि पहले दक्षिण बस्तर ज़ोनल कमेटी के प्रमुख रहे रामन्ना हमेशा आक्रामक शैली में काम करते रहे हैं।

76 सीआरपीएफ़ जवानों को मारने के अलावा 2010 में ही यात्रियों से भरी बस को धमाका करके उड़ाने की योजना भी उन्ही की थी जिसमें 17 लोगों की मौत हुई थी।

वो स्टेट मिलिट्री कमीशन के सदस्य भी हैं।

कहा जाता है कि पिछले साल दंतेवाड़ा के जिलाधीश एलेक्स पाल मेनन के अपहरण के बाद उनकी रिहाई के लिए नक्सलियों की शर्तें कभी नहीं मानी गईं और इससे नक्सलियों के एक वर्ग में असंतोष था।


उनका कहना था कि इस तरह की कार्रवाइयों से नक्सल आंदोलन को कुछ हासिल नहीं होने वाला है। उल्लेखनीय है कि सरकार ने कुछ नक्सली नेताओं की रिहाई का आश्वासन दिया था जो कभी पूरा नहीं किया गया।

शुभ्रांशु चौधरी बताते हैं कि छत्तीसगढ़ के अधिकारी जानते हैं कि अपनी धमक जमाने लिए रामन्ना किसी भी हद तक जा सकते हैं। अगर वे चौकन्ने हो जाते तो शनिवार की घटना को रोका जा सकता था।

उनका कहना है कि रामन्ना के हाथ में दंडकारण्य स्पेशन ज़ोन की कमान रही तो आगे भी कई हिंसक घटनाओं की आशंका बनी रहेगी।

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