मोदी के न्यायिक नियुक्ति आयोग में फंसा एक और पेंच
सर्वोच्च और उच्च न्यायालयों में जजों की नियुक्ति के लिए कोलेजियम सिस्टम को खत्म कर राष्ट्रीय न्यायिक नियुक्ति आयोग लाने में भले ही केंद्र सरकार सफल रही हो लेकिन अभी भी इसकी राह में कई रोड़े हैं।
कोलेजियम सिस्टम को लेकर विधायिका और न्यायपालिका के बीच लड़ाई का एक अध्याय खत्म हो चुका है लेकिन अभी सर्वोच्च अदालत में लड़ाई का एक और राउंड होना बाकी है। सरकार के इस बिल को सर्वोच्च अदालत में कई लोग चुनौती देने को तैयार बैठे हैं।
राष्ट्रीय न्यायिक नियुक्ति आयोग विधेयक लाकर विधायिका ने न्यायाधीशों की नियुक्ति में अपनी भागीदारी सुनिश्चित कर ली है लेकिन न्यायपालिका हमेशा से इसे अपनी स्वतंत्रता पर अतिक्रमण बताती रही है।
कानूनविदों के बीच एक बार फिर न्यायपालिका और विधायिका के बीच संवेदनशील रिश्ते पर चर्चा शुरू हो गई है। चर्चा यह हो रही है कि क्या सचमुच इस नई व्यवस्था से न्यायाधीशों की नियुक्ति की प्रक्रिया में पारदर्शिता आएगी या यह न्यायपालिका का गला घोंटना है।
सर्वोच्च अदालत में होगी अपील
वरिष्ठ वकील फली एस. नरीमन पहले ही इशारा कर चुके हैं कि वह इस बिल को सुप्रीम कोर्ट में चुनौती देंगे। वास्तव में नरीमन पहले भी इस विधेयक को चुनौती दे चुके हैं लेकिन उस वक्त सुप्रीम कोर्ट ने यह कहते हुए उनकी याचिका पर सुनवाई से इनकार कर दिया था कि अभी विधेयक कानून नहीं बना है।
ऐसे में अदालत के हस्तक्षेप का कोई मतलब नहीं है। हालांकि उस वक्त अदालत ने नरीमन से यह जरूर कहा था कि उचित समय आने पर वह फिर से अदालत का दरवाजा खटखटा सकते हैं।
नरीमन ने उस याचिका में केशवानंद भारती मामले का हवाला देते हुए कहा था कि संसद किसी संशोधन के जरिए संविधान के तहत न्यायपालिका को मिले अधिकार और उसकी स्वतंत्रता में फेरबदल नहीं कर सकता। लिहाजा यह तय माना जा रहा है कि नरीमन फिर से इस विधेयक को चुनौती देंगे। इतना ही नहीं कई और वकील और एसोसिएशन भी विधेयक को चुनौती देने के लिए तैयार बैठे हैं। सभी को बस सर्वोच्च अदालत के खुलने का इंतजार है।