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दुष्कर्म से जुड़े कानून पर आज फैसला करेगी कैबिनेट
नई दिल्ली/ब्यूरो
Updated Tue, 12 Mar 2013 12:40 AM IST
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सरकार महिला उत्पीड़न संबंधी कानून पर विभिन्न मंत्रालयों में पनपे मतभेदों को दूर कर अपराध संशोधन कानून बिल को मंगलवार को कैबिनेट में पेश कर देगी।
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बीते दिसंबर में दिल्ली में हुई गैंगरेप की घटना के बाद महिलाओं के खिलाफ हिंसा से जुड़े कानून में बदलाव की जस्टिस जेएस वर्मा समिति, जस्टिस उषा मेहरा कमीशन और संसद की स्थायी समिति ने कई सिफारिशें दी हैं। इस मुद्दे पर विचार के लिए मंगलवार को विशेष कैबिनेट की बैठक बुलाई गई है।
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महिला उत्पीड़न के खिलाफ सख्त कानून को लागू करने की देशव्यापी मांग के दबाव में सरकार इस बिल को संसद के इसी सत्र में पास करवाना चाह रही है। बलात्कार के बाद हत्या के जघन्य मामलों में फांसी और पुलिस व प्रशासनिक तंत्र को महिलाओं के प्रति संवेदनशील बनाने के मुद्दे पर आम सहमति के बावजूद कई मामलों में मंत्रालयों में मतभेद उभर कर सामने आए हैं।
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बलात्कार की जगह महिला यौन उत्पीड़न जैसे शब्द के इस्तेमाल पर कानून मंत्रालय और गृह मंत्रालय ने विरोध किया है। नाबालिगकी उम्र सीमा को 18 से घटाकर 16 साल किए जाने पर भी महिला व बाल कल्याण, गृह और कानून मंत्रालय में सहमति नहीं बना पा रही थी। सोमवार को गृह मंत्री सुशील कुमार शिंदे ने जानकारी दी कि इस सभी मतभेदों को दूर कर लिया गया है। अब इस बिल पर मंगलवार को बुलाई गई विशेष कैबिनेट में अंतिम फैसला लिया जाएगा।
16 साल होगी सहमति से संबंध बनाने की उम्र
अपराध कानून संशोधन बिल के तैयार मसौदे में कम से चार प्रावधान ऐसे हैं, जो महिलाओं की सुरक्षा पर हाल में लाए गए अध्यादेश से अलग हैं।
इस बिल में सहमति से शारीरिक संबंध बनाने की उम्र 18 से घटाकर 16 साल किए जाने का प्रस्ताव है। इस प्रस्ताव को लेकर कई मंत्रालय में गहरे मतभेद थे, हालांकि बाद में इन्हें दूर कर लिया गया। सहमति से कम उम्र में बनाए गए संबंध को दुष्कर्म माना जाता है।
इसके अलावा इस बिल में दुष्कर्म को सिर्फ महिलाओं के खिलाफ अपराध मानने की बात है, जबकि अध्यादेश में यौन हमले शब्द का इस्तेमाल किया गया था, जो कि जेंडर न्यूट्रल था। ऐसे में बिल पास होने के बाद दुष्कर्म का मामला केवल पुरुषों पर दर्ज हो सकेगा।
वहीं, यदि सरकारी अधिकारी दुष्कर्म का दोषी पाया जाता है तो इसमें उसके लिए ताउम्र कैद का प्रावधान है, जबकि अध्यादेश में उम्रकैद की बात थी। इसके अलावा एक नया प्रस्ताव यह है कि देश के सभी सरकारी और निजी अस्पतालों को यौन हिंसा की शिकार महिला पीड़ितों को तत्काल मुफ्त इलाज मुहैया कराना होगा। इससे इनकार करने वाले अस्पतालों के वरिष्ठ अधिकारियों और वहां मौजूद स्टाफ को एक साल की सजा का प्रावधान किया गया है।