'मौत' के बाद रेडियो पर 'मन की बात' कहने वाले थे नेताजी
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नेताजी सुभाष चंद्र बोस रेडियो के जरिए भारत की जनता से संपर्क बनाना चाहते थे। ये खुलासा उनसे संबंधित फाइलों के सार्वजनिक होने के बाद हुआ है। इसके मुताबिक 1945 में नेताजी की मौत की खबर के चार साल बाद 1949 में वह एक रेडियो चैनल पर लोगों को संबोधित करने वाले थे।
नेताजी के पोते एसके बोस (नेताजी के भाई शरतचंद्र बोस के बेटे) की ओर से 1949 में लिखे एक पत्र से इसका खुलासा हुआ है। इस पत्र में उन्होंने अपने पिता शरत चंद्र बोस को पेकिंग रेडियो की उस घोषणा की जानकारी दी है, जिसमें कहा गया था नेताजी रेडियो पर उद्घोषणा करने वाले हैं।
इस प्रसारण का समय और रेडियो वेवलेंग्थ की भी जानकारी दी गई थी। आजाद हिंद फौज के हांगकांग दफ्तर ने इसे सुनने की भी कोशिश की लेकिन कुछ भी सुना नहीं जा सका।
नेता जी ही थे गुमनामी बाबा?
वहीं बहुत से लोग इस बात पर यकीन करते हैं कि नेता जी फैजाबाद में कई साल तक गुपचुप तरीके से रहने वाले वो साधू थे, जिन्हें गुमनामी बाबा कहा जाता है। फैजाबाद में सरयू नदी के किनारे गुप्तार घाट में गुमनामी बाबा की समाधि है।
18 सितंबर 1985 में गुमनामी बाबा के निधन के बाद यहीं उनका अंतिम संस्कार किया गया। इस पर गुमनामी बाबा की जन्मतिथि 23 जनवरी 1897 दर्ज है। यानी वो तारीख जब नेता जी का जन्म हुआ। गुमनानी बाबा के अतीत के बारे में ज्यादा जानकारी नहीं है।
वह कुछ समय अयोध्या में रहे थे। 1982 से वो फैजाबाद के राम भवन में आकर रहने लगे थे। गुमनामी बाबा को करीब से देखने वाले कहते हैं कि उनकी बहुत सी बातें नेता जी से मिलती-जुलती थीं।
धाराप्रवाह बोलेते थे जर्मन, संस्कृत और बंगाली
गुमनामी बाबा की तस्वीर उन्हें देखने वालों के बयान के आधार पर एक चित्रकार ने बनाई है, लेकिन उन्हें देखने वाले कहते हैं कि वो नेता जी की तरह ही छह फुट के थे। वह धाराप्रवाह जर्मन, संस्कृत और बंगाली बोलते थे।
उनकी मौत के बाद राम भवन से उनका चश्मा, कई दस्तावेज, खत भी मिले जो गुमनामी बाबा के नेता जी होने के शक को पुख्ता करते हैं।
कहा जाता है कि वह बहुत कम लोगों से मिलते जुलते थे। गुमनामी बाबा ही अगर नेता जी थे तो सवाल है कि उनकी मौत पर बने आयोग ये सच क्यों नहीं तलाश सके कि विमान हादसे के बाद भी वो जिंदा थे।
नेताजी की मौत की जांच के लिए 1956 और 1977 में दो आयोग बनाए। दोनों आयोग ने कहा कि नेता जी की मौत ताइवान में विमान हादसे में हुई मगर, दोनों आयोग ने ताइवान सरकार से बातचीत नहीं की थी।
गुमनामी बाबा और उनका सामान
गुमनामी बाबा की मौत के बाद उनके कमरे से जो सामान बरामद हुआ उसी ने ही सबसे पहले दुनिया के मन में यह सवाल उठाया कि कहीं यह शख्स नेताजी तो नहीं थे?
वजह कि सामान में नेताजी सुभाष चंद्र बोस के परिवार की तस्वीरों के अलावा सबसे ज्यादा चिट्ठियां मिलीं जो कलकत्ता से लोग लिखते थे। इनमें आजाद हिंद फौज के पवित्र मोहन राय, लीला राय और समर गुहा आदि प्रमुख थे।
इतना ही नहीं जब उनके निधन के बाद उनके नेताजी होने की बातें फैलने लगीं तो नेताजी की भतीजी ललिता बोस कोलकाता से फैजाबाद आईं और गुमनामी बाबा के कमरे से बरामद सामान देख कर यह कहते हुए फफक पड़ीं थीं यह सब कुछ उनके चाचा का ही है।