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एनडीपीएस अधिनियम का अक्षरश: पालन करे पुलिस

Mon, 17 Dec 2012 11:29 PM IST
नई दिल्ली/अमर उजाला ब्यूरो
नई दिल्ली/अमर उजाला ब्यूरो Updated Mon, 17 Dec 2012 11:29 PM IST
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ndps act literally adhere to police

नशे के सौदागरों पर लगाम कसने में लापरवाह पुलिस को सुप्रीम कोर्ट ने एनडीपीएस अधिनियम के प्रावधानों का अक्षरश: पालन करने का निर्देश दिया है। बड़े पैमाने पर प्रावधानों का उल्लंघन होने पर कोर्ट ने सभी राज्यों के पुलिस महानिदेशकों (डीजीपी) को अधिनियम की धारा 42 का पालन करने को कहा है।

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सर्वोच्च अदालत ने चरस आदि नशीली वस्तु की सूचना मिलने पर जांच अधिकारी की ओर से अपने वरिष्ठ अधिकारी को सूचित करने और प्राप्त सूचना को लिखित में दर्ज करने के प्रावधान के पालन न होने पर यह कदम उठाया। सर्वोच्च अदालत ने कहा है कि इस धारा का पालन न होने पर तस्करी के अभियुक्त बड़ी तादाद में बरी हो रहे हैं।

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जस्टिस स्वतंत्र कुमार और जस्टिस मदन लोकुर की पीठ ने कहा कि एनडीपीएस एक्ट में 2001 में संशोधन किया गया। इस संशोधन के जरिए सूचना प्राप्त होने की स्थिति में अपने वरिष्ठ अफसरों को सूचित करने की अवधि 72 घंटे निर्धारित की गई। यानी मादक पदार्थ की सूचना मिलने के तीन दिन के अंदर जांच अधिकारी को अपने वरिष्ठ अधिकारी को लिखित जानकारी देने का प्रावधान किया गया।
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इससे पहले इस तरह की सूचना तुरंत भेजने का प्रावधान था। निर्दोष को झूठा न फंसाया जाए, इस कारण संसद ने कानून में बदलाव किया। राज्यों के डीजीपी से कहा गया है कि इस प्रावधान का सख्ती से पालन किया जाए ताकि नशीले पदार्थों के तस्कर तकनीकी आधार पर बरी न हो सके।

सुप्रीम कोर्ट ने पंजाब और हरियाणा हाईकोर्ट के फैसले के खिलाफ सुखदेव सिंह की अपील पर यह बात कही। ट्रायल कोर्ट और हाईकोर्ट ने उसे दस साल के कठोर कारावास का दंड दिया था। सुप्रीम कोर्ट ने धारा 42 का पालन न होने पर उसे बरी कर दिया। धारा 42 के तहत जांच अधिकारी को बगैर किसी वारंट या अधिकार पत्र के ही तलाशी लेने, मादक पदार्थ जब्त करने और गिरफ्तारी करने का अधिकार है।


लेकिन इस धारा में यह भी प्रावधान है कि मादक पदार्थों के बारे में यदि किसी अधिकारी को गुप्त सूचना मिलती है तो उसे तत्काल अपने वरिष्ठ अधिकारी को इसकी सूचना देनी चाहिए। पीठ ने अपने फैसले में सभी राज्यों के पुलिस महानिदेशकों को निर्देश दिया कि सभी जांच अधिकारियों को एनडीपीएस कानून की धारा 42 के प्रावधानों पर ठीक तरीके से अमल करने के लिए उचित निर्देश दिया जाए ताकि ऐसे मामलों में आरोपियों के बरी होने की घटनाओं से बचा जा सके।

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