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ललित मोदी के खिलाफ बॉम्बे हाईकोर्ट ने जारी किया वारंट

Wed, 05 Aug 2015 01:38 PM IST
Updated Wed, 05 Aug 2015 01:38 PM IST
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NBW against Lalit Modi

पूर्व आईपीएल कमिश्नर ललित मोदी के खिलाफ बॉम्बे हाईकोर्ट ने गैर जमानती वारंट जारी किया है। कोर्ट ने यह वारंट मोदी के खिलाफ चल रहे मनी लॉन्डरिंग के मामले में जारी किया है।

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गौरतलब है कि मनी लॉन्डरिंग के मामले में प्रवर्तन निदेशालय ने ललित मोदी के खिलाफ केस दर्ज करा रखा है और उसने पिछले हफ्ते वारंट जारी कराने के लिए कोर्ट में अर्जी दी थी। इस गैर जमानती वारंट के बाद ललित मोदी की गिरफ्तारी की संभावनाएं बढ़ गई हैं।
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विशेष न्यायाधीश पीआर भावाके ने पूछा था कि एजेंसी उन्हें गिरफ्तार क्यों नहीं कर रही है और गैर-जमानती वारंट मांगा। उन्होंने जानना चाहा कि क्या जांच के दौरान वारंट जारी किया जा सकता है। ईडी के वकील हितेन वेनेगांवकर ने कहा कि ललित मोदी भारत में उपलब्ध नहीं हैं, इसलिए एनबीडब्ल्यू जारी किया जाना चाहिए।
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उन्होंने दावा किया कि ललित को 2009 से अबतक जारी किए गए समन का उन्होंने पालन नहीं किया है। न्यायाधीश ने पूछा कि क्या ललित मोदी अदालत के समक्ष आरोपी हैं, क्योंकि ईडी ने उनके खिलाफ आरोपपत्र दाखिल नहीं किया है। न्यायाधीश भावाके ने कहा कि एनबीडब्ल्यू जारी करने के लिए व्यक्ति को अदालत के समक्ष आरोपी होना चाहिए।

ईडी के वकील ने कहा कि मामला पूर्व-जांच के स्तर पर है और सुप्रीम कोर्ट ने पिछली एक व्यवस्था में कहा था कि जांच के दौरान एनबीडब्ल्यू जारी किया जा सकता है।

सिंगापुर और मॉरीशस से मांगी मदद

NBW against Lalit Modi

अदालत ने पिछले महीने सिंगापुर और मॉरीशस को अनुरोध पत्र जारी किये थे और मामले में वहां के अधिकारियों से सहायता मांगी है। गौरतलब है कि ईडी ने 3 जुलाई को समन जारी कर ब्रिटेन में बैठे ललित मोदी से 15 दिनों के भीतर जांच एजेंसी के समक्ष आने को कहा था,लेकिन वह नहीं आए।

इस पर ईडी ने कोर्ट से गुहार लगाई अाैर अदालत ने वारंट जारी ‌किया। उल्लेखनीय है कि बीसीसीआई ने 2010 में ललित मोदी के खिलाफ चेन्नई में केस दर्ज कराया था।

2008 में बीसीसीआई ने डब्ल्यूएसजी को 91.8 करोड़ डॉलर में 10 साल के मीडिया अधिकार दिए थे। फिर डब्ल्यूएसजी ने एमएसएम से करार करके सोनी को आधिकारिक प्रसारणकर्ता बनाया। बाद में करार को नौ साल के करार से बदल दिया गया जहां एमएसएम ने डब्ल्यूएसजी को 1.63 अरब डॉलर का भुगतान किया।

बाद में फेमा कानून के तहत ईडी ने 2009 में डब्लयूएसजी मॉरीशस को एमएसएम सिंगापुर द्वारा अनधिकृत तरीके से 425 करोड़ रुपये की सुविधा शुल्क के भुगतान के आरोपों की जांच शुरू की।

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