आतंकी नहीं हाथी बने चुनौती, चुनाव कराना मुश्किल!
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चुनाव से हाथियों का भला क्या रिश्ता हो सकता है? यह सवाल कुछ अजीब लग सकता है। लेकिन देश के पूर्वोत्तर हिस्से में दोनों के बीच गहरा रिश्ता है। यहां होने वाले चुनावों में हाथियों की अहम भूमिका होती है।
इस लोकसभा चुनावों में तो इलाके के अलग-अलग राज्यों में हाथी एक-दूसरे की विपरीत भूमिकाओं में हैं। मेघालय और त्रिपुरा में हाथी चुनाव अधिकारियों के दुश्मन बन गए हैं तो पड़ोसी असम और अरुणाचल प्रदेश में उनके साथी और मददगार।
मेघालय के चुनाव अधिकारियों को मतदान के दिन जंगली हाथियों के हमले का डर सता रहा है। राज्य के गारो पर्वतीय क्षेत्र में 200 से ज्यादा मतदान केंद्रों को संवेदनशील की श्रेणी में रखा गया है। इसकी वजह उग्रवादी नहीं, बल्कि हाथियों के हमले का खतरा है।
तोड़फोड़ रोकने के लिए कर्मचारी तैनात
इलाके में मतदान के दिन हाथियों का हमला रोकने के लिए जंगल विभाग के अफसर और कर्मचारी अभी से मुस्तैद हैं। भारत-बांग्लादेश सीमा पर बसी गारो पहाड़ियों के अलावा राज्य के वेस्ट खासी हिल्स और री-भोई जिले में भी कुछ मतदान केंद्र असम के जंगलों से सटे हैं और वहां से हाथियों के झुंड अक्सर नजदीकी बस्तियों में जाकर तोड़फोड़ मचाते हैं।
मेघालय के मुख्य चुनाव अधिकारी पी नायक कहते हैं, ‘पिछले चुनावों में हाथियों के हमले से काफी गड़बड़ हुई थी। उसे ध्यान में रखते हुए इस बार हम कोई खतरा नहीं उठाना चाहते। वन विभाग के सुरक्षा कर्मचारियों को अभी से मुस्तैद कर दिया गया है।’
उन्होंने कहा कि चुनाव अधिकारियों को भी ऐसी असामान्य समस्या यानी हाथियों के हमले से उपजी परिस्थिति से निपटने के लिए रणनीति बनाने का निर्देश दिया गया है। उन इलाकों में तैनात चुनाव कर्मचारियों को पटाखों के अलावा आत्मरक्षा के हथियार भी दिए जाएंगे।
हथियों को भगाने के लिए हाथी ले रहे ट्रेनिंग
वन विभाग के एक अधिकारी बताते हैं कि हाथियों को झुंड को खदेड़ने के लिए प्रशिक्षित हाथियों और उनके महावत के साथ सुरक्षा कर्मी मतदान केंद्रों के आसपास मौजूद रहेंगे। उनके साथ ढोल-नगाड़े लेकर स्थानीय आदिवासी लोग भी होंगे।
त्रिपुरा के पश्चिमी इलाके में स्थित तेलियामुरा और अठारामुरा के अलावा दक्षिण त्रिपुरा के अमरपुर फारेस्ट रेंज में भी अक्सर जंगली हाथियों का झुंड खाने की तलाश में नजदीकी बस्तियों में जाकर घरों और खड़ी फसलों को नुकसान पहुंचाता है।
वहां भी चुनाव विभाग ने ऐसे हमलों को रोकने के लिए ऐहतियाती इंतजाम किए हैं।
अरुणाचल और असम में हाथी मददगार
अरुणाचल प्रदेश में यही हाथी चुनाव अधिकारियों के लिए सबसे बड़ा सहारा बन गए हैं। राज्य के कई मतदान केंद्र दुर्गम इलाकों में स्थित हैं। वहां तक पहुंचने के लिए कर्मचारियों को एक सप्ताह से दस दिनों तक पैदल चलना पड़ता है।
चुनाव केंद्रों तक कर्मचारियों, चुनाव सामग्री और इलेक्ट्रानिक वोटिंग मशीनें पहुंचाने के लिए विभाग ने 20 हाथियों का सहारा लिया है। राज्य के तिराप, चांगलांग और लोहित जिलों में इनका इस्तेमाल किया जाएगा।
राज्य चुनाव विभाग के एक अधिकारी बताते हैं कि पिछले लोकसभा चुनावों की तरह इस बार भी कई दुर्गम मतदान केंद्रों तक पहुंचने के लिए प्रशिक्षित हाथियों का सहारा लिया जा रहा है। फिलहाल 20 हाथियों के जरिए कर्मचारियों और चुनाव सामग्री को संबंधित इलाकों में भेजा जा रहा है।
चीनी सीमा में साथी बने हाथी
चीन और भूटान की सीमा पर स्थित अरुणाचल पश्चिम और अरुणाचल पूर्व क्षेत्रफल के लिहाज से देश के क्रमश: चौथे और पांचवें सबसे बड़े संसदीय क्षेत्र हैं।
दक्षिणी असम के बांग्लादेश से लगे करीमगंज संसदीय क्षेत्र में भी हाथी चुनाव अधिकारियों के सबसे बड़े साथी बने हैं।
हैलाकांदी के जिलाशासक तपन चंद्र गोस्वामी बताते हैं, ‘यहां चुनाव कर्मचारियों और सामग्री को जिले के पांच दुर्गम गांवों तक पहुंचाने के लिए छह हाथियों का सहारा लिया जाएगा।’ उन गावों तक जाने के लिए कोई सड़क नहीं है। इस सीट पर 16 अप्रैल को वोट पड़ेंगे।