आजादी का मतलब ये नहीं कि सरकार और भगवान भरोसे बैठें
आजाद मुल्क में सबकी आजादी के मायने अलग हैं। किसी के लिए आजादी केवल 15 अगस्त तक सीमित होता है तो न जाने कितने मुल्क के लिए अपने प्राणों की आहुति दे देते हैं।
फिल्म अभिनेता नवाजुद्दीन सिद्दीकी मुल्क की आजादी पर कहते हैं कि मेरी फिल्म माझी द माउंटेन मैन का एक संवाद है कि, भगवान के भरोसे मत बैठो शायद भगवान तुम्हारे भरोसे ही बैठा हो।
आजाद देश में हमको मौका मिला है, अपने हुनर को दिखाने का मगर आजादी का ये मतलब बिल्कुल नहीं है कि, हम सरकार और भगवान के भरोसे बैठे रहें। बड़े से बड़े काम के लिए निकलने से पहले डर को दिल से निकालना जरूरी है।
हम आजाद हैं इसलिए खुद पर भरोसा रखो। मैंने बॉलीवुड में बहुत संघर्ष किया मगर मेरी हिम्मत और लगन ने मुझको मुकाम दिया। ये इस आजादी की बदौलत है कि आपको आपका हुनर और हिम्मत दिखाने से कोई नहीं रोकेगा तो आप क्यों रुक रहे हो। आगे बढ़ो।
अभी बेटियों के जन्म की आजादी बाकी है
फिल्म अभिनेत्री आलिया भट्ट का मानना है कि हम आजाद हैं, इस देश में जन्म लिया है यह गर्व की बात है, लेकिन आज भी बेटियों के जन्म पर घरों में उत्सव नहीं मनाया जाता है। महिलाओं को बेटियों के जन्म की स्वतंत्रता मिलना अभी बाकी है।
परिवार को चाहिए कि बेटी को अपनी पसंद का कॅरियर चुनने की आजादी दे। संविधान में अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता दी गई है लेकिन चाहे सोशल मीडिया हो या समाज, युवा को अपना हक मांगने या खुलकर सवाल पूछने पर कई सवाल उठने लगते हैं, यह बंद होना चाहिए।
नौजवानों को भी देश के प्रति, समाज के प्रति जिम्मेदारी उठानी होगी। युवा द्वारा पूछे गए सवालों को हंसी में उड़ाना या टाल देना दुखद है।
जमीन छोड़ने का बहुत मलाल हुआ था
फरजाना इकबाल। ऐसा शायद ही किसी के साथ हुआ हो कि उसका जन्म भारत में हुआ, पाकिस्तान में जवानी गुजरी और निकाह बरेली में हुआ। फरजाना कहती हैं कि देश जब आजाद हुआ तब मैं पांच साल की थी, मगर उस वक्त की बहुत बातें आज भी यादों में ताजा है। जन्म तो मेरा बरेली में ही हुआ, मगर उस ऐतिहासिक दिन मैं लुधियाना में थी।
पिता का कारोबार वहीं था, इसलिए परिवार वहीं रहता था। उस वक्त की ज्यादा याद नहीं। हां इतना तो याद आता है कि लोग उस दिन एक-दूसरे को मुबारकबाद दे रहे थे। देश की गौरवमय गाथा के नारे लगा रहे थे, पटाखे छोड़ रहे थे।
जश्न जैसा माहौल था। तब मुझे लुधियाना से अपने परिवार के साथ पाकिस्तान जाना पड़ा। कई दिन शिविर में रहे। अपनी जमीन छोड़ने का बहुत मलाल हुआ था। 17 साल बाद इत्तफाक ऐसा हुआ कि शादी हिंदुस्तान में ही हुई। खुशी की बात यह रही कि मैं अपनी जन्म भूमि बरेली ही लौट आईं। यहां आकर दिल को बहुत तसल्ली मिली।
गेट पर चढ़कर देखा था आजादी का जश्न
वह 15 अगस्त 1947 की खुशनुमा सुबह थी। तड़के ही लोग घर से बाहर निकल आए थे। सड़क पर जश्न का माहौल था। स्टेशन रोड से तहसील की तरफ आने वाला रास्ते पर हुजूम उमड़ पड़ा था।
लोगों के चेहरे खुशी से दमक रहे थे। मैं सदर तहसील गेट के ऊपर चढ़कर यह नजारा देखकर उत्साहित था। उस दिन को मैं कभी नहीं भूल सकता। आजादी के साल मैं गोरखपुर के इस्लामिया इंटर कॉलेज में नौवीं का छात्र था।
उस समय देश में खुशी का माहौल था। लेकिन आज .... आज के जो हालात है उन्हें देखकर यही कहा जा सकता है कि देश को दो हिस्से में बांटकर अंग्रेज अपने मकसद में कामयाब हो गए।