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नवीन पटनायक का दावा भी किसी से कम नहीं

Thu, 20 Mar 2014 11:01 AM IST
Updated Thu, 20 Mar 2014 11:01 AM IST
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Naveen Patnaik is not less than anyone

अंक एक, दृश्य छह, स्थान- कटक, कंधमाल। मुख्य पात्र-नवीन पटनायक। इतिहास गवाह है कि कोई भी जानवर आज तक डूबकर नहीं मरा। सुनामी न आ जाए तो वह हमेशा तैरकर पार निकल जाता है चाहे 'पार उतरि कहँ जइहौं' न जानता हो। नदी उसकी रिहाइश से जितनी भी दूर ठहरे, उसे तैरना आ ही जाता है। यह कमोबेश उसके डीएनए में होता है कि नदियों-तालाबों से साबक़ा पड़ेगा और तैरकर जाना होगा।

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सारी इच्छा-अनिच्छा, सारे विरोध, विसंगतियों-विरोधाभासों के बावजूद, पानी देखते ही तैराकी वाला उसका एंटीना सक्रिय हो उठता है। जातक कथाओं और पंचतंत्र की कहानियों में ऐसे क़िस्से भरे पड़े हैं। बेहिसाब मुहावरे हैं। घड़ियाल और बंदर की कहानी है। उस बिल्ली के बच्चे की भी, जिसे किसी ने तैरना नहीं सिखाया लेकिन आसन्न संकट देखते ही उसने पानी में छलांग लगा दी और बच गया।
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इस तर्क का स्वाभाविक विस्तार तो यही होगा कि इसे जानवरों के साथ-साथ आदमियों पर भी लागू किया जा सके, इसलिए कि उन्हें सहारा देने वाली प्रकृति एक ही है। इसलिए भी कि इंसान मूलतः पशु ही है। समाजशास्त्री तो अपनी हर पोथी के पहले ही अध्याय में लिख देते हैं कि इंसान एक राजनीतिक पशु है।
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सियासत और डूबकर मरना

Naveen Patnaik is not less than anyone

जानवर सियासत नहीं करते, इसलिए डूबकर नहीं मरते। इंसान सियासत करते हैं इसलिए डूबकर मर जाते हैं। हिंदुस्तान लोकतांत्रिक गणतंत्र है तो डूबने की घटनाएं कुछ ज़्यादा ही होती हैं। मगर सब डूब जाते हों ऐसा भी नहीं होता, कुछ पार भी उतरते हैं। भले ही उन्होंने नदी का तट पहली बार देखा हो। ऐसे ही लोगों के बारे में कहा जाता है कि उन्हें राजनीति विरासत में मिली है, उनके ख़ून में है।

इससे क्या फ़र्क़ पड़ता है कि कोई हमेशा दूर-दूर रहा और कभी राजनीति नहीं की। यह भी नहीं सीखा कि लोगों से किस ज़ुबान में बात करें। इसके बावजूद लोगों ने उसे अपना नेता चुना और लगातार तीन बार मुख्यमंत्री बना दिया। बाद की राजनीति तो उसने ख़ुद की और बख़ूबी की। ओडिशा के मुख्यमंत्री नवीन पटनायक अपने पिता के निधन तक अलग ढंग का जीवन जी रहे थे।

अमेरिका में थे, किताबें लिखते थे, जैकी कैनेडी के मित्र थे, मिक जैगर के साथ घूमते थे, उनके मित्र हर क्षेत्र में थे और आज भी हैं। उद्योगपतियों में टाटा, बिड़ला और जिंदल से लेकर पत्रकारिता में करण थापर और स्वप्न दास गुप्ता तक। राजनीतिक मित्र इनके अलावा। कहते हैं कि नवीन कांग्रेस पार्टी की अध्यक्ष सोनिया गांधी को तमाम कांग्रेसियों से बेहतर जानते हैं। एक ज़माने में, स्कूल के दिनों में, पहले वेलहम ब्वॉयज़ और बाद में दून स्कूल में संजय गांधी उनके रूममेट थे।



बीजेपी के पुराने साथी

Naveen Patnaik is not less than anyone

राजीव गांधी से निकटता ऐसी थी कि उन्हें प्रधानमंत्री निवास या दस जनपथ जाने के लिए किसी से कहना या पूछना नहीं पड़ता था। वह 'एनी टाइम विज़िटर' थे। पिता की बीमारी के समय नवीन अमेरिका से लौटकर जनता दल में शामिल हुए और 1996 में लोकसभा पहुंचे, केंद्र में मंत्री भी बने। अगले साल उन्होंने बीजू जनता दल बनाया और भारतीय जनता पार्टी से गठबंधन कर लिया जो साल 2009 तक चलता रहा।

तब तक नवीन पटनायक की छवि एक साफ़-सुथरे ईमानदार नेता की थी। भ्रष्टाचार के आरोप या नैतिक आधार पर 26 मंत्री निकाल चुके नवीन को फिर भी एक बड़ा नेता नहीं माना जाता था। लेकिन कंधमाल के दंगों, उसमें बजरंग दल की भूमिका और लक्ष्मणानंद की हत्या के बाद धर्मनिरपेक्ष छवि वाले सिद्धांतवादी नवीन पटनायक का उदय हुआ।

उन्होंने भाजपा से नाता तोड़ लिया और राष्ट्रीय आतंकवाद विरोधी केंद्र, एनसीटीसी, पर वह केंद्र सरकार से टकराए। दो साल बाद, 2012 में, उन्होंने षड्यंत्र के आरोप में अपने नज़दीकी सहयोगी प्यारीमोहन महापात्रा को बाहर का रास्ता दिखा दिया।

प्यारीमोहन कभी बीजू पटनायक के प्रधान सचिव थे और आमतौर पर ओडिशा में, और दिल्ली में भी, यही माना जाता था कि ओडिशा की सरकार वही चलाते हैं, असली नेता वही हैं, नवीन मात्र मुखौटा हैं। नवीन लंदन में थे जब उन्हें पता चला कि प्यारीमोहन भारतीय जनता पार्टी के साथ मिलकर सरकार का तख़्ता पलटना चाहते हैं।

वह आनन-फ़ानन लौटे और षड्यंत्र वहीं ख़त्म हो गया। दरअसल 21 संसदीय सीटों वाले ओडिशा की राजनैतिक हैसियत वैसे बहुत नहीं है लेकिन कांग्रेस और बीजेपी के बहुमत से दूर रहने की स्थिति में वे प्रधानमंत्री पद के लिए एक स्वीकार्य चेहरा हो सकते हैं।

बढ़ती जा रही है लोकप्रियता

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ओडिशा की जनता को इस बात का मलाल आज भी है कि जनता दल के शासन के वक़्त बीजू बाबू प्रधानमंत्री बनते-बनते रह गए। यह क्षेत्रीयता भी इस बार के चुनावों में बीजू जनता दल को ज़्यादा सीटें दिला सकती है। बीजू जनता दल का लोकसभा में सर्वश्रेष्ठ प्रदर्शन 2009 में 14 सीट का रहा है।

पार्टी का मत प्रतिशत और सीट संख्या 1998 से हर चुनाव में बढ़ती ही गई है और इस बार भी लगता है कि बढ़ेगी। उसे विधानसभा चुनावों में 39 फ़ीसदी मत मिले थे और ज़िला परिषदों में 30 में 28 पर उसका नियंत्रण है। परिषद की साढ़े आठ सौ सीटों में से लगभग साढ़े छह सौ उसके पास हैं।

हैरानी की बात यह है कि भारतीय जनता पार्टी से अलग होने के बाद बीजू जनता दल की सीटें, वोट प्रतिशत और नवीन पटनायक की लोकप्रियता बेतहाशा बढ़ी है। यानी यह कि भाजपा का राज्य में जो आधार था वह मूलतः नवीन पटनायक के कारण था। उसे नवीन की धर्मनिरपेक्ष छवि का फ़ायदा मिल रहा था।

पहले दिन से आज तक नवीन पटनायक की आलोचना सिर्फ़ एक बात के लिए होती है और वह यह कि वह अन्य उड़िया लोगों की तरह उड़िया नहीं बोल पाते। अब भी रुक-रुक कर बोलते हैं, बोलते समय अटकते हैं लेकिन चंद्रभागा के राजनीतिक सागर में तैरना तो उन्हें आ ही गया है।

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