असम हिंसाः मारने नहीं, गांवों से भगाने की थी साजिश

Rakesh Jha Updated Mon, 13 Aug 2012 05:38 PM IST
assam violence villages had to flee from plot
बोडो के वर्चस्व वाले कोकराझार, धुबड़ी और चिरांग सहित बोडोलैंड क्षेत्रीय स्वायतशासी जिलों (बीटीएडी) के गांवों में गैर बोडो मुसलिम समुदाय पर हुए हमलों में एकरूपता उभर कर सामने आई है। हमलावरों का उद्देश्य था कि ज्यादा लोग न मरें। वे दहशत फैला कर लोगों को गांवों से भगाना चाहते थे। हमलावर अपने इस मकसद में कामयाब रहे। नतीजा यह हुआ कि गैर बोडो मुसलिम सुमदाय के करीब 3.50 लाख लोग गांव छोड़ शहरों की तरफ भाग खड़े हुए और अंतत: राहत शिविरों में शरण ली।

राहत शिविरों में रह रहे हिंसा पीड़ितों ने बताया कि सभी हमले दोपहर बाद ही किए गए। हमलावर ज्यादातर सेना के परिधान में होते थे और उनके मुंह ढके होते थे। बीलासीपाड़ शिविर के शाहनवाज ने हमले के पैटर्न की सबसे खास बात बताई।

शाहनवाज के मुताबिक हथियारों से लैस हमलावरों ने गांव वालों को घेर कर नहीं मारा, बल्कि वे गांव के एक तरफ से गोलियों की बौछार करते थे ताकि दूसरी तरफ से लोगों के भागने के लिए रास्ता खुला रहे। हमलावर लोगों को सीधा निशाना बनाने की बजाए दीवारों और मवेशियों पर गोलियां चला रहे थे। इसी शिविर में शरण लिए हुए इस्माइल रजा के मुताबिक हमलावर सिर्फ मुसलिम समुदाय के लोगों के घरों में आग लगा रहे थे। दूसरे समुदाय के घरों को छुआ तक नहीं गया।

कई लोगों ने हिचकते हुए बताया कि हमलावर बोडो से अलग हो चुके उग्रवादी संगठन बीएलटी के सदस्य थे। दरअसल इस संगठन ने स्वायत्त बोडो क्षेत्र के आंदोलन में मुख्य भूमिका निभाई थी। 2003 में बोडो के स्वायत्त बीटीएडी के गठन के बाद इसका विघटन कर दिया गया।

बताया जाता है कि इनके पास हथियार अब भी मौजूद हैं। इन्हें इलाके में एक्स-बीएलटी के नाम से जाना जाता है। गृह मंत्री पी चिदंबरम ने मंगलवार को इलाके के दौरे के बाद कहा कि बोडो समुदाय के इस कैडर के पास मौजूद हथियारों को जब्त किया जाएगा।

हिंसा थमने के बाद सरकारी एजेंसियों की तहकीकात में भी हमले के इस पैटर्न की बात सामने आई है। राज्य खुफिया विभाग के अधिकारी के मुताबिक बीटीएडी की जमीनों पर गैर बोडो मुसलमानों के बढ़ते हक की वजह से तनाव बढ़ा। यही वजह है कि इन मुसलमानों को गांवों से उखाड़ने के उद्देश्य से यह सुनियोजित हमले किए गए। वैसे मुख्यमंत्री तरुण गोगोई पूर्व में हुए हमलों के मुकाबले इस बार कम लोगों के मरने की बात कर रहे हैं।

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