बरबादे गुलिस्तां करने को बस एक ही उल्लू काफी था...

स्योहारा/ब्यूरो Updated Fri, 16 Nov 2012 02:06 PM IST
nation pays homage to hilal seoharvi
बरबादे गुलिस्तां करने को बस एक ही उल्लू काफी था,
हर शाख पे उल्लू बैठा है, अंजाम ए गुलिस्तां क्या होगा...
जैसी शायरी से समाज को आगाह करने वाले शायर हिलाल स्योहारवी का गुरुवार को निधन हो गया। हिलाल स्योहारवी पिछले छह दशकों से अपनी रचनाओं के माध्यम से भाषायी सद्भाव में प्रयासरत थे।

15 जनवरी, 1928 को जन्मे हिलाल स्योहारवी का नाम हबीबुर्रहमान था। फरेबे सहर, फरेबे नजर, अंगुठा छाप, अगर बुरा न लगे उनकी उर्दू तथा धुंधला सवेरा और नुकता ए नजर उनकी हिंदी में प्रकाशित पुस्तकें हैं। हिलाल स्योहारवी को 1987-88 में उर्दू अकादमी दिल्ली ने तंजोमिजाह गालिब अवार्ड से सम्मानित किया, जो उन्हें तत्कालीन उपराष्ट्रपति डॉ. शंकरदयाल शर्मा ने प्रदान किया था।

मजदूरों के दुख तकलीफों को हिलाल स्योहारवी ने बडे़ निकट से देखा और फिर उसे हास्य की चाशनी में भिगोकर दुनिया के सामने इस ढंग से प्रस्तुत किया कि कड़वी बातें भी दिल की गहराइयों में उतर जाएं। जब राजीव गांधी प्रधानमंत्री थे और उनके साथ ही बेनजीर भुट्टो पाकिस्तान की प्रधानमंत्री बनीं तो स्योहारवी ने लिखा...

रश्क होता है तेरी किस्मत पे,
क्या तेरे हाथ को लकीर मिली,
और तो सब नियामतें मिली थी तुझे,
अब पड़ोसन भी बेनजीर मिली।

...और दिल में रह गई मिलने की कसक
गीतकार अशोक मधुप का कहना है कि हिलाल स्योहारवी से वायदा किया था कि स्योहारा आकर एक रात उनके पास ठहरूंगा और पूरी रात शेरोशायरी की महफिल जमेगी, किंतु जिंदगी ने उनके साथ बैठने और सुनने के लिए एक रात की भी फुरसत नहीं दी। हिलाल स्योहारवी के स्टेज पर आते ही मुशायरे का माहौल बदल जाता था। पत्रकारिता के दौरान उनसे दोस्ती हुई तो कई बार बैठने और सुनने का अवसर मिला। बस उन्हें किसी तरह एक बार शुरू करा दिया जाए, फिर तो उनकी रचनाएं टेप रिकार्डर की तरह उनकी जबान पर आती चली जाती। डॉ. मनोज कुमार वर्मा के सहयोग से उनकी हिंदी में एक पुस्तक नुक्ता ए नजर हाल ही में बाजार में आई।

स्योहारवी की कुछ रचनाएं
बिगड़े हुए हालात पर नेताओं का जवाब
लोग हमसे रोज करते हैं सवाल,
कोई बतलाऐ के हम बतलाएं क्या।
राजनीति है पहेली की तरह,
हम ही खुद समझे नहीं समझाएं क्या।
                         
हमारा मुल्क
हमारा मुल्क जो रूह ए जमीं पर मिस्ले जन्नत है।
हमारा मुल्क जो लाखों शहीदों की अमानत है।
हमारा मुल्क वीरों सूरमाओं का जियालों का।
हमारा मुल्क जो मिसकिन रहा अल्लाह वालों का।
हमारा मुल्क ऋषियों का, मुनि और देवताओं का।
हमारे मुल्क पर साया बुजुर्गों की दुआओं का।

जूता
कैसे मुमकिन है कि दुनिया में कोई भी इंसान,
बल के तकदीर के तदबीर से लड़ सकता है,
जिसकी ईजाद थी पैरों की हिफाजत के लिए
क्या खबर थी कि वो कभी सर पे भी पड़ सकता है।

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