जानिए, क्या है नाथूराम गोडसे का अलवर कनेक्शन?
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अलवर में एक फ्लाइओवर का नामकरण महात्मा गांधी के हत्यारे नाथूराम गोडसे के नाम पर करने की कोशिश की गई। पुल के उद्घाटन के लिए जहां शिलापट्ट लगाया जाना था, वहां नाथूराम गोडसे का नाम लिख दिया गया।
मामला प्रकाश में आया तो प्रशासन ने आननफानन में गोडसे का नाम मिटवा दिया। एफआईआर दर्ज की गई और एक व्यक्ति को गिरफ्तार कर लिया गया। प्रशासन ने त्वरित कार्रवाई कर मामले को रफादफा करने की कोशिश की। हालांकि वाकये ने नाथूराम गोडसे और अलवर के पुराने रिश्तों को जरूर तरोताजा कर दिया।
दरअसल अलवर ही वह शहर है, जहां से नाथूराम गोडसे को महात्मा गांधी की हत्या के लिए हथियार मिला था। गोडसे और उसके सहयोगी नारायण आप्टे को हथियार अलवर के महाराजा ने दिया था। आजादी से पहले तक अलवर राजस्थान की मामूली रियासत थी। इतिहास में किसी और कारण से इसे जाना भी नहीं जाता।
महात्मा गांधी की हत्या के लिए हथियार उपलब्ध कराने के कारण ये रियासत इतिहास मे दर्ज हो गई।
अलवर में हुए थे मुस्लिम विरोधी दंगे
जानकारों का कहना है कि नाथूराम गोडसे और नारायण आप्टे ने अलवर में कई बैठकें भी की थी। उन्होंने वहां भड़काऊ भाषण भी दिए। महात्मा गांधी की हत्या के षडयंत्र में अलवर के महाराजा और प्रधानमंत्री एनबी खरे की भूमिका की जांच भी हुई थी।
हालांकि दोनों के ही खिलाफ आरोप तय नहीं हो पाया। ऐसे ठोस सुबूत भी सामने नहीं आ पाए, जिस ये तय हो पाए कि गोडसे और आप्टे ने अलवर की यात्रा की ही थी। वैसे माना जाता है कि हिंदू महसभा के साथ अलवर के प्रगाढ़ रिश्ते थे। एनबी खरे हिंदू महासभा की गतिविधियों में शामिल भी होते थे।
खरे वीडी सावरकर के पुराने सहयोगी थे। भारत विभाजन के बाद अलवर में कई मुस्लिम विरोधी दंगे हुए, जिसमें स्थानीय प्रशासन की भूमिका संदि्ग्ध मानी गई। उन दिनों अलवर के प्रशासनिक अमले का नेतृत्व एनबी खरे ही कर रहे थे।
आडवाणी से भी हुई थी अलवर को लेकर पूछताछ
इतिहासकारों के मुताबिक, उन दिनों अलवर में मुसलमानों को बड़ी संख्या में मारा गया। कांग्रेस की बैठकों में भी अलवर में हुए अत्याचारों की चर्चा हुई। महात्मा गांधी ने अलवर के स्थानीय प्रशासन की तुलना जनरल डायर से की की थी। उल्लेखनीय है कि जनरल डायर ने ही जलियांवाला बाग हत्याकांड करवाया था।
खरे 1949 से 1951 तक हिंदू महासभा के अध्यक्ष भी रहे थे। वह कांग्रेस में भी रह चुके थे। इतिहासकारों का कहना है कि विभाजन के दौरान मेवात के इलाके में, अलवर जिसका हिस्सा है, मियो मुस्लमानों का सफाया कर दिया गया और बलपूर्वक धर्म परिवर्तन भी कराया गया।
भाजपा में पितृपुरुष का दर्जा प्राप्त वरिष्ठ नेता लालकृष्ण आडवाणी ने अपनी किताब में लिखा है कि जिस दिन महात्मा गांधी की हत्या हुई वह अलवर में ही थे। वह अलवर और भरतपुर में राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के प्रचारक के रूप में काम कर रहे थे। हत्या के बाद उन्हें भी जेल में रहना पड़ा। आडवाणी से गोडसे और अलवर के संबंधों के बारे में पूछताछ भी की गई थी।