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मोदी के सामने 2014 का किला फतह करने की चुनौती
नई दिल्ली/हिमांशु मिश्र
Updated Mon, 17 Jun 2013 12:11 AM IST
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कभी एनडीए के सहारे 24 दलों की अगुवाई करने वाली भाजपा जदयू का साथ छोड़ते ही फिर राजनीतिक रूप से लगभग अछूत की हालत में खड़ी दिख रही है। भाजपा अब पूरी तरह से हिंदुत्व के फायर ब्रांड नेता गुजरात के मुख्यमंत्री नरेंद्र मोदी के हवाले है।
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कभी राजनीतिक छुआछूत से पार्टी को बचाने के लिए कट्टर चेहरा माने जाने वाले लालकृष्ण आडवाणी ने उदार चेहरे वाले अटल बिहारी वाजपेयी को आगे किया था। तब पार्टी के पास कट्टर और उदार चेहरे के रूप में आडवाणी और वाजपेयी का मजबूत समीकरण था।
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मगर अब पूरी पार्टी कट्टर चेहरा माने जाने वाले मोदी के इर्द-गिर्द सिमट गई है। जाहिर है कि एकला चलो की राह पर बढ़ चुकी भाजपा को अपने दम पर आगे बढ़ाने का जिम्मा भी अब मोदी को ही उठाना होगा।
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उनके सामने न केवल पार्टी की सीटें बढ़ाने, बल्कि गठबंधन की राजनीति में नए साथियों को तलाशने की चुनौती भी आ खड़ी हुई है।
जदयू की जुदाई के बाद एनडीए में प्रमुख रूप से बाकी बचे दल शिवसेना और अकाली दल ही हैं। इन दोनों दलों की विचारधारा भाजपा की विचारधारा से बहुत अलग नहीं है। बाकी बचे हरियाणा जनहित कांग्रेस या आरपीआई का कोई बड़ा राजनीतिक वजूद नहीं है।
जदयू के जाने के बाद भाजपा एकमात्र जयललिता की एआईएडीएमके की भविष्य में एनडीए के साथ आने की संभावना देख सकती है। वहीं अगर पार्टी ने हरियाणा में इनेलो को साथ लिया तो हजकां उससे दूर हो जाएगी।
जहां तक राजग के अन्य पुराने सहयोगियों की बात है तो इनमें से तृणमूल कांग्रेस, टीडीपी, बीजेडी, नेशनल कांफ्रेंस जैसे दलों का एनडीए में शामिल होने का इरादा दूर-दूर तक नहीं दिखता।
नेशनल कांफ्रेंस वैसे भी फिलहाल यूपीए के साथ है तो राजग के पुराने सहयोगी गैरएनडीए-गैरयूपीए विकल्प खड़ा करने की जद्दोजहद में जुटे हैं। इनमें जयललिता भी शामिल हैं जिन्हें एनडीए उम्मीद भरी नजरों से देख रहा है।
जहां तक भाजपा का सवाल है तो उसकी नई राह कम रपटीली नहीं है। मोदी को पहले तो अपने दम पर पार्टी को ज्यादा से ज्यादा सीटें दिलानी होंगी और फिर चुनाव के बाद अपनी राजनीतिक स्वीकार्यता की लड़ाई अलग से लड़नी होगी।
मोदी के पास न तो वाजपेयी जैसा उदारवादी राजनीतिक चेहरा है और न ही राम मंदिर जैसा बड़ा चुनावी मुद्दा।
सीटों का गणित
भाजपा लोकसभा की 545 सीटों में से 200 सीटों पर तो महज अपनी उपस्थिति दर्ज कराने के लिए लड़ती है। बाकी बची 345 सीटों में से महज 265 सीटें ऐसी हैं जिस पर पार्टी ठीक ठाक चुनाव लड़ती है।
बीते चुनाव में पार्टी 116 सीटें हासिल कर पाई थी। इसके अलावा 80 सीटों पर पार्टी दूसरे स्थान पर थी। इन सीटों में से ज्यादातर सीटों पर हार-जीत का अंतर बहुत ज्यादा था।
इसलिए मोदी के सामने चुनौती है कि इन 265 सीटों पर वह कितना करिश्मा दिखा पाएंगे। मोदी अपने करिश्मे के बदौलत दिल्ली, राजस्थान, हरियाणा, उत्तराखंड और उत्तर प्रदेश में सीटों की संख्या बढ़ा सकते हैं।
मगर दूसरी ओर उन्हें छत्तीसगढ़, कर्नाटक, झारखंड, हिमाचल प्रदेश जैसे राज्यों में सीटों का नुकसान भी उठाना पड़ सकता है।