जानिए, मोदी ने कैसे लिखी जीत की इबारत
बेशक राजनीति में न कोई पूर्ण विराम होता है, न कोई शब्द आखिरी। मगर लोकसभा के बाद हरियाणा और महाराष्ट्र विधानसभा चुनावों के नतीजों ने देश की राजनीति में नए और बदलते दौर की इबारत तो जरूर लिख दी है।
इन दोनों ही राज्यों में चौथे नंबर की पार्टी भाजपा को अपने दम पर सत्ता पर बिठाने का करिश्मा कर दिखाने वाले प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी नि:संदेह इस बदलती राजनीति को अपने हिसाब से मोड़ दे रहे हैं।
लोकसभा के बाद दोनों राज्यों के चुनाव नतीजों से साफ है कि जनता सुशासन और विकास की राजनीति के लिए जातिगत खांचे और पुराने राजनीतिक समीकरणों को पूरी तरह ध्वस्त करने को तैयार है।
राजनीति के खांचे को बदलने का यही भरोसा पैदा कर मोदी ने चौथे नंबर ही नहीं बिना चेहरे वाली पार्टी को दो राज्यों में सत्ता में बिठा कर सियासत की इस नई करवट को पेश किया है।
मोदी ने पेश किया विकासवादी चेहरा
इस जीत के साथ मोदी ने धर्मनिरपेक्षता की राजनीति करने वाले विपक्षी दलों को भी न केवल मुद्दा विहीन बना दिया है, बल्कि इनके सामने अपनी काट के लिए नए दौर की राजनीति के अनुरूप मॉडल खड़ा करने की चुनौती भी पेश कर दी है।
दरअसल हिंदूवादी राजनीति के फायरब्रांड नेता के तौर पर उभरे मोदी ने लोकसभा चुनाव के बाद अपने पुराने चेहरे को पीछे कर विकासवादी चेहरा पेश किया है। विपक्ष की मुश्किल यह है कि मोदी के इस नए चेहरे पर भी मतदाता लगातार न्यौछावर हो रहे हैं।
लड़ाई अब कांग्रेस बनाम अन्य की जगह भाजपा-मोदी बनाम अन्य की हो गई है। मोदी ने हरियाणा में चौटाला, देवी लाल तो महाराष्ट्र में ठाकरे और पवार की घराना राजनीति की दुकान को फिलहाल फीका कर दिया है।
इन नतीजों का सियासी संकेत यह भी है कि मोदी का कद उनकी पार्टी से भी बड़ा होने की राह पर तो है ही, साथ ही आने वाले कई सालों में देश की राजनीति का केंद्र बिंदु भी वही होंगे।
इंदिरा युग के दिनों की यादें ताजा
मोदी के इस करिश्मे ने 70 और 80 के दशक के दौर की याद ताजा कर दी हैं, जब कांग्रेस पूरी तरह इंदिरा गांधी के भरोसे थी। इंदिरा की तरह ही क्षेत्रीय क्षत्रपों के युग का अंत कर देने का संकेत देते हुए दोनों ही राज्यों में मतदाताओं ने भ्रष्टाचार पर मोदी के प्रहार के साथ सुशासन और विकास के नारे को समर्थन दिया।
करीब तीन दशक बाद ऐसी स्थिति बनी जब विधानसभा चुनाव में क्षत्रपों के बदले मोदी के रूप में केंद्रीय चेहरे के साथ राज्यों के मतदाता खड़े नजर आए।
चौथे नंबर की पार्टी ने कब्जाई सत्ता
हरियाणा और महाराष्ट्र के नतीजे इसलिए भी अहम हैं क्योंकि मोदी ने दो ऐसे राज्यों में महज अपने दम पर पार्टी को सत्ता में बिठाने का करिश्मा कर दिखाया है, जहां पार्टी के पास न तो कोई चेहरा था और न ही भाजपा पहले और दूसरे नंबर की पार्टी थी।
सच तो यह है कि दोनों ही राज्यों में वह चौथे नंबर की पार्टी थी। महाराष्ट्र में शिवसेना और हरियाणा में हजकां से नाता तोड़ने के बावजूद भी यह करिश्मा हुआ।