'मोदी की झाड़ू' थामने से होगी क्या जोशी की घर वापसी?
खबरें लगातार पढ़ने के लिए अमर उजाला एप डाउनलोड करें
या
वेबसाइट पर पढ़ना जारी रखने के लिए वीडियो विज्ञापन देखें
अगर आपके पास प्रीमियम मेंबरशिप है तो
2005 में एक सेक्स सीडी सामने आई और संजय जोशी को भाजपा के सभी पदों से इस्तीफा देना पड़ा। राजनीति की चौपड़ पर शह और मात का खेल शातिराना होता है।
दशक भर पहले संजय जोशी की गिनती भाजपा के ताकतवर नेताओं में होती थी। वे आरएसएस के लाडले थे, लेकिन एक सेक्स सीडी ने उन्हें वानप्रस्थ आश्रम की ओर भेज दिया। बाद में पता चला की सीडी फर्जी थी। पता ये भी चला कि सीडी गुजरात पुलिस के पूर्व डीआईजी डीजी वंजारा के इशारों पर सार्वजनिक की गई थी। वंजारा उस जमाने के गुजरात के मुख्यमंत्री नरेंद्र मोदी के बहुत ही करीबी थी। शक की सुई घूमकर मोदी की ओर गई।
हालांकि असलीयत सामने आते-आते तकरीबन पांच साल लग गए। और तब तक मोदी के रसूख के आगे टिक पाना जोशी के बस की बात नहीं रह गई थी।
पुरानी है नरेंद्र मोदी और संजय जोशी की अदावत
नरेंद्र मोदी और संजय जोशी की अदावत पुरानी रही है। गुजरात से लेकर केंद्र की राजनीति तक, एक दूसरे को मात देने का एक भी मौका दोनों ने नहीं छोड़ा। हालांकि पिछले सप्ताह लखनऊ में संजय जोशी और प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के पोस्टर एक साथ दिखे तो राजनीतिक सरगर्मी बढ़ गई।
बुधवार को संजय जोशी ने प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के महात्वाकांक्षी कार्यक्रम स्वच्छता अभियान में हिस्सा लिया। झाड़ू लगाने के बाद उन्होंने मोदी की तारीफ में कसीदे भी पढ़े। जोशी ने कहा कि प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी जनप्रिय नेता हैं। उन्होंने स्वच्छता अभियान से आम जन को भी जोड़ा।
आरएसएस ने भी हाल ही में अहमदाबाद में आयोजित एक कार्यक्रम में नरेंद्र मोदी और संजय जोशी दोनों को ही बुलाया। जानकारों का मानना है कि नए समीकरणों को दोनों नेताओं के रिश्तों पर जमी बर्फ के पिघलने का संकेत माना जा सकता है। लेकिन क्या ये इतना आसान है?
2011 में मोदी के कारण जोशी को देना पड़ा इस्तीफा
सीडी प्रकरण का पटाक्षेप 2011 में ही हो गया था। गुजरात लॉबी के विरोध के बाद भी आरएसएस के प्रयासों से संजय जोशी की भाजपा में वापसी हो गई। तत्कालीन भाजपा अध्यक्ष नीतिन गडकरी ने उन्हें उत्तर प्रदेश विधानसभा चुनावों का प्रभारी नियुक्त कर दिया था।
राष्ट्रीय राजनीति में आने का प्रयास कर रहे मोदी तब भी उन्हें अपने लिए खतरा मानते थे। उन्होंने जोशी के कारण ही मई, 2012 में मुंबई में आयोजित राष्ट्रीय कार्यकारिणी के बैठक में शामिल होने से मना कर दिया। मोदी, जोशी को भाजपा की राष्ट्रीय कार्यकारिणी से बाहर किए जाने पर अड़े हुए थे।
कहा जाता है कि मोदी ने नीतिन गडकरी से मुलाकात की थी और जोशी को हटाने की मांग की थी। नीतिन गडकरी ने ऐसा करने से मना किया तो मोदी ने कार्यकारिणी का बहिष्कार करने की बात कह दी।
मोदी के खिलाफ पोस्टरबाजी, संजय को समर्थन
मोदी की वह जिद भाजपा में अध्यक्ष के घटते रसूख का संकेत मानी गई। जानकारों का कहना है कि मोदी की जिद को संघ समेत कई भाजपा नेताओं ने अच्छा संकेत नहीं माना।
लेकिन गुजरात लॉबी पार्टी में इतनी ताकतवार थी की मोदी के आगे किसी की नहीं चली। कार्यकारिणी से दो घंटे पहले जोशी को इस्तीफा देना पड़ा। इस्तीफे के तुरंत बाद ही मोदी मुंबई रवाना हो गए थे।
जोशी के इस्तीफे के बाद मोदी के विरोध में गुजरात, मध्य प्रदेश, राजस्थान और उत्तर प्रदेश में खूब पोस्टरबाजी भी हुई थी। दिल्ली और अहमदाबाद में जोशी के समर्थन में और मोदी के विरोध में पोस्टर लगे और उस पर लिखा गया- 'छोटे मन से कोई बड़ा नहीं होता। टूटे मन से कोई खड़ा नहीं होता। कहो दिल से संजय जोशी फिर से।
जोशी ने ही लिया था आडवाणी से इस्तीफा
2005 में लालकृष्ण आडवाणी को जब पकिस्तान के संस्थापक मोहम्मद अली जिन्ना की तारीफ करने के कारण अध्यक्ष पद से इस्तीफा देना पड़ा था, उस समय जोशी भाजपा के राष्ट्रीय महासचिव (संगठन) थे। आडवाणी से इस्तीफा उन्होंने ही लिया था।
मोदी से उम्र में तकरीबन 12 साल छोटे जोशी की राजनीतिक कर्मभूमि भी गुजरात ही रही। गुजरात में बीजेपी को संगठित करने में जोशी ने अहम भूमिका भी निभाई, लेकिन मोदी ने उन्हें हमेशा दूसरे गुट का आदमी माना।
1998 में गुजरात में शंकर सिंह बाघेला के विरोध के बाद नरेंद्र मोदी को गुजरात की राजनीति से बाहर कर दिया गया।
मोदी की वापसी के बाद जोशी हो गए गुजरात से बाहर
मोदी के बाहर जाने के बाद भाजपा गुजरात में कामयाब रही। जोशी को भाजपा की गुजरात इकाई का महासचिव बना दिया गया। माना जाता है कि उस प्रकरण के बाद से मोदी, जोशी को अपना विरोधी मानने लगे।
मोदी को खुद को गुजरात से बाहर किए जाने के पीछे जोशी को ही कारण मानते थे।
हालांकि 2001 में मोदी की गुजरात की राजनीति में वापसी हो गई। केशुभाई पटेल को हटाकर मोदी को गुजरात का मुख्यमंत्री बनाया गया। मोदी की ताजपोशी के बाद संजय जोशी को गुजरात की राजनीति को अलविदा कहना पड़ा।