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किस मजबूरी में मोदी ने मिलाया नवाज से हाथ?

Sat, 11 Jul 2015 02:32 PM IST
Updated Sat, 11 Jul 2015 02:32 PM IST
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narendra modi and nawaz sharif political compulsion and ufa talks

भारत के प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और पाकिस्तानी प्रधानमंत्री नवाज शरीफ ने गतिरोध की शिकार हुई द्विपक्षीय वार्ता को फिर से शुरू करने का फैसला किया है।

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इसके साथ उन्होंने अपने राष्ट्रीय सुरक्षा सलाहकारों से जल्द ही ‘आतंकवाद से जुड़े सभी मुद्दों’ पर बातचीत के लिए बैठक बुलाने को कहा है। एक दूसरे की राजनीतिक मजबूरियों को समझते हुए, दोनों देशों के विदेश सचिवों ने संयुक्त बयान के उस हिस्से को पढ़ा, जो अचानक वार्ता के तैयार होने के कारणों को घरेलू वोटरों के सामने स्पष्ट करता ज्यादा लगता है।
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उफा में हुई घोषणा, राजनीतिक बातचीत के फिर से शुरू होने का संकेत है और दोनों पक्षों को यह दावा करने का मौका देती है कि दूसरे ने पहल कदमी की है।

नवाज शरीफ कह सकते हैं कि उन्होंने मोदी को अपनी सरकार के अड़ियल रुख को छोड़ने के लिए मजबूर किया कि वार्ता तभी हो सकती है जब पाकिस्तान ‘चरमपथ और हिंसा’ को दूर रखकर बातचीत का माहौल तैयार करे।
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आज भी जमीनी हालात, मई के महीने से अलग नहीं हैं, जब विदेश मंत्री सुषमा स्वराज ने उस शर्त पर जोर दिया था। या इस साल की शुरुआत में नियंत्रण रेखा पर जब फायरिंग की घटनाओं के समय जैसे हालात थे।

यह भी कि अगर संयुक्त बयान में कश्मीर का साफ साफ जिक्र नहीं किया जा रहा है या तात्कालिक किसी कदम की बात न की जा रही हो तो पाकिस्तानी प्रधानमंत्री यह श्रेय लेने का दावा कर सकते हैं कि मोदी को उन्होंने मुद्दों पर बिना शर्त बातचीत के लिए तैयार कर लिया।

दोनों झुके हैं?

narendra modi and nawaz sharif political compulsion and ufa talks

दूसरी तरफ, उफा बयान में मोदी के लिए भी इस दावे के लिए पर्याप्त कूटनीतिक ढाल मौजूद है कि उन्होंने पाकिस्तानी पक्ष को थोड़ा झुकने पर मजबूर किया है। आखिरकार, पहली उच्च स्तरीय बातचीत के केंद्र में चरमपंथ है, जो एक ऐसा मुद्दा है जिसके बारे में भारत का मानना है कि यह सबसे महत्वपूर्ण मुद्दा है।

पाकिस्तान ने भी इस संभावना को मान लिया है कि 26/11 के मुंबई हमले में चरमपंथियों और उनके सहयोगियों के आवाज के नमूने, लश्कर ए तैय्यबा कमांडर जकी उल रहमान लखवी और अन्य के खिलाफ मुकदमा चलाने में सबूत बन सकते हैं।

दूसरी तरफ, मोदी पर इस बात का जवाब देने का बहुत दबाव होगा कि उन्होंने क्यों एक साल बर्बाद किया, जबकि इन मुद्दों पर बातचीत हो सकती थी।और शायद इस पर कोई सहमति भी बन सकती थी अगर उन्होंने अगस्त 2014 में दोनों देशों के विदेशी सचिवों की बैठक को राजनीतिक कमजोरी के चलते निरस्त न कर दिया होता।

ये तो प्रधानमंत्री का सौभाग्य है कि उनके विरोधी उन्हें चरमपंथ के सवाल पर समझौता करने का आरोप लगा रहे थे, बजाय उनके असमंजस पर निशाना साधने के। तो, फिर यहां से रास्ता कहां को जाता है?

बयानबाजी

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उफा समझौता भारत और पाकिस्तान के संबंधों में एक साल की महान उम्मीद, अनिश्चय और तनाव पर विराम लगाता है। लेकिन यदि इसे सही तरीके से आगे बढ़ाना है तो मोदी और शरीफ, दोनों की तरफ से निरंतता और राजनीतिक साहस दिखाने की बहुत जरूरत पड़ेगी।

यहाँ बातचीत केवल रिश्तों को आगे ले जाने के लिए ही जरूरी नहीं है बल्कि यह भी सुनिश्चित करने के लिए जरूरी है कि इसमें कोई दुराव नहीं पैदा हो रहा है। मोदी और शरीफ की मुलाकात का तत्काल सबसे बड़ा असर तो यह है कि नुकसानदायक बयानबाजी में कमी आएगी।

इस तरह की बयानबाजियों में, भारत की ओर से मंत्रियों ने पाकिस्तान को सैन्य कार्रवाई और यहां तक कि चरमपंथ का समर्थन करने तक की धमकी दी थी।

नवाज की स्थिति कमजोर?

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जबकि पाकिस्तान के राजनीतिक और सेना के शीर्ष लोगों ने भारत पर पाकिस्तान के अंदर चरमपंथी हमले आयोजित करने का आरोप लगाया था। दोनों नेताओं में से पाकिस्तान के प्रधानमंत्री राजनीतिक रूप से अधिक असुरक्षित हैं।  

जबकि मोदी राजनीतिक रूप से कहीं अधिक सुरक्षित हैं, केवल इसलिए नहीं कि उनको संसदीय बहुमत हासिल है बल्कि इसलिए कि अपनी पार्टी या संघ परिवार में आलोचनाओं और नुक्ताचीनी करने वालों को लेकर उन्हें चिंता नहीं करनी है।

उफा एक नया मोड़ साबित हो सकता है, अगर विपक्ष और मीडिया के एक हिस्से के कट्टर राष्ट्रवाद के सामने वो न झुकें।

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