मां, मोदी और प्रधानमंत्री, इसे कहते हैं किस्मत!
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16 मई को जैसे-जैसे ईवीएम की सील खुली, भाजपा को मिशन 272 नजदीक आता दिख्रने लगा। भाजपा की जीत तय मानकर नरेंद्र मोदी ने अपनी मां के घर की ओर रुख किया।
सफेद साड़ी में घर वालों से घिरी, कुर्सी पर बैठी हीराबेन ने मोदी को देखते ही दोनों हाथों मे समेट लिया। मोदी ने झुककर मां का आशीर्वाद लिया, साथ बैठे और बातें की। मां के पास मोदी ऐसी तसल्ली में दिखे, जैसे चुनाव प्रचार की थकान मिट गई हो।
पिछले 30 या 35 सालों में ये पहला मौका था, जब देश का भावी प्रधानमंत्री अपनी मां के आशीर्वाद ले रहा था। क्योंकि कई सालो बाद देश को ऐसा प्रधानमंत्री मिला है, जिसके पास मां है।
मोदी संभवतः पहले पीएम, जिनकी मां जीवित
मां से आशीर्वाद लेने का ये पहला मौका नहीं था। नरेंद्र मोदी पिछले विधानसभा चुनाव में गुजरात में भाजपा को जीत दिला चुके हैं। चुनाव के हर नतीजे के बाद उन्होंने मां का आशीर्वाद लिया।
पिछले साल अपने जन्मदिन के मौके पर नरेंद्र मोदी ने मां हीराबेन से मुलाकात की, तब उन्होंने मोदी को यथार्थ गीता भेंट की थी।
देश की बागडोर संभालने जा रहे नरेंद्र मोदी के सिर पर पिता का साया बहुत दिनों तक नहीं रहा लेकिन मां के साथ उनका रिश्ता आज भी अटूट है। मोदी संभवतः देश के ऐसे पहले पीएम हैं, जिनकी मां जीवित हैं।
मोदी ने बचपन में रेलवे स्टेशन पर बेची चाय
बचपन में कई तरह की विषमताओं ओर विपरीत परिस्थितियों का सामना करने वाले नरेंद्र मोदी का जन्म 17 सितंबर 1950 को गुजरात में मेहसाणा जिले के वड़नगर कस्बे में हुआ था।
पिता दामोदर दास मोदी परिवार के पालन-पोषण के लिए वड़नगर रेलवे स्टेशन पर एक छोटी सी चाय की दुकान चलाते थे। माता हीराबेन ने भी घर में बच्चों की देखभाल में कोई कसर नहीं छोड़ी। नरेंद्र मोदी की प्रारंभिक शिक्षा वड़नगर में ही हुई और इसी के साथ वह पिता के काम में भी हाथ बंटाते रहे।
फिर भाई के साथ मिलकर पहले बस स्टैंड पर चाय की दुकान लगाई और उसके बाद गुजरात रोड ट्रांसपोर्ट एसोसिएशन की स्टाफ कैंटीन में भी काम किया।
बचपन से ही संघ से जुड़ गए थे नरेंद्र मोदी
इसी के साथ उन्होंने अपनी पढ़ाई भी जारी रखी। 1980 में गुजरात विश्वविद्यालय से राजनीति शास्त्र में एम.ए. किया।
बचपन से ही संघ की स्थानीय शाखा में नियमित रूप से जाने वाले मोदी 1972 में राष्ट्रीय स्वयं सेवक संघ के प्रचारक बन गए और आरएसएस में अपने कार्यकाल के दौरान 19 महीने (जून 1975 से जनवरी 1977) आपातकाल के समय अत्यंत महत्वपूर्ण भूमिकाएं निभाई।
इस दौरान भूमिगत रहते हुए गुप्त तरीके से केंद्र सरकार की फासीवादी नीतियों के खिलाफ जोशीले अंदाज में जंग छेड़ते हुए लोकतंत्र की भावना को जीवित रखा।
1987 में मोदी ने भाजपा में प्रवेश किया
1987 में भाजपा में प्रवेश कर उन्होंने राजनीति की मुख्यधारा में कदम रखा और एक साल के अंदर ही अपने काम की बदौलत गुजरात की पार्टी इकाई के महासचिव बन गए।
1995 में भाजपा के राष्ट्रीय सचिव बनाए गए। अक्तूबर, 2001 में पार्टी के केंद्रीय नेतृत्व ने गुजरात के तत्कालीन मुख्यमंत्री केशुभाई पटेल की जगह उन्हें राज्य का मुख्यमंत्री पद सौंपा।
इससे पहले जनवरी, 2001 में आए भूकंप सहित अन्य कई प्राकृतिक आपदाओं के विपरीत प्रभावों से राज्य गुजर रहा था।
दंगे का कलंक भी लगा मोदी पर
मोदी ने प्रतिकूल परिस्थितियों को सर्वांगीण विकास के अवसरों में तब्दील कर दिया। भुज शहर (भूकंप में नष्ट हुआ) उसका जीता-जागता सबूत है।
हालांकि फरवरी, 2002 में गोधरा कांड के बाद पूरा राज्य दंगों की आग में झुलस गया, जिसमें मोदी भी अछूते नहीं रह सके और दंगे का कलंक उन पर भी लगा।
दिसंबर, 2002 के विधानसभा चुनाव में मोदी के नेतृत्व में भाजपा की भारी जीत हुई और वह दूसरे कार्यकाल के लिए मुख्यमंत्री चुने गए। दिसंबर, 2007 में हुए विधानसभा चुनाव में मोदी ने भाजपा को पुन: भारी बहुमत दिलाया और तीसरी बार राज्य के मुख्यमंत्री बने।
2012 में मोदी ने हासिल की लगातार तीसरी जीत
दिसंबर, 2012 के विधानसभा चुनाव में तीसरी बार जीत हासिल कर मोदी ने साबित कर दिया कि आलोचक और विरोधी चाहे कुछ भी दावे करें, लेकिन गुजरात में अभी उनका कोई विकल्प नहीं है।
राज्य में भाजपा की यह लगातार पांचवीं जीत थी और मोदी चौथी बार राज्य के मुख्यमंत्री बने।
इतने साल तक लगातार गुजरात के मुख्यमंत्री रहने के बाद भी मोदी पर सीधे तौर पर भ्रष्टाचार के कोई आरोप नहीं लगे। राज्य में तकनीक के सही उपयोग से कार्यप्रणाली में पारदर्शिता बढ़ी।