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'मेरी बेटियों ने दिलाई एक नई पहचान'
अमर उजाला, इलाहाबाद
Updated Mon, 06 Jan 2014 12:20 PM IST
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'मेरी बेटियां मेरी शान' हैं क्योंकि उन्होंने मुझे नई पहचान दिलाई है। अब मुझे एक शिक्षक के अतिरिक्त योग्य बेटियों के पिता के रूप में भी जाना जाता है।
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मुझे वह दिन कभी नहीं भूलेगा जब मेरे एक मित्र, राजस्व विभाग के एक वरिष्ठ प्रशासनिक अधिकारी के साथ मुझसे मिलने आए और उन्होंने उनसे मेरा परिचय कराया।
इस पर उन अधिकारी ने फौरन कहा, 'हां मैंने डॉक्टर साहब का नाम सुना है। वह सफल बेटियों के पिता भी है। मेरी सबसे बड़ी बेटी क्षमा तिवारी, पीएचडी है।
उसे दर्शनशास्त्र में 'सर्वश्रेष्ठ निबंध' का अवार्ड मिला। साथ में वह राष्ट्रीय छात्रवृत्ति के लिए भी चुनी गई। दूसरी बेटी श्रद्धा, डिग्री कालेज में प्रवक्ता है। पीसीएस-2011 में भी उसका चयन हुआ था लेकिन उसने ज्वाइन नहीं किया।
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इसी तरह तीसरी बेटी निष्ठा पहले ही प्रयास में, पहले डिप्टी एसपी और फिर आईआरएस के लिए चुनी गई। सबसे छोटी बेटी आस्था भी पीसीएस है। श्रद्धा और निष्ठा को इलाहाबाद विश्वविद्यालय के चांसलर मेडल से भी नवाजा जा चुका है।
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श्रद्धा पढ़ाई के साथ खेल में भी उतनी ही मेधावी है। बॉस्केटबाल में वह यूपी टीम का प्रतिनिधित्व करने सहित विश्वविद्यालय टीम की कप्तान रही और 'कलर' भी पा चुकी है।
मुझे वह दिन भी नहीं भूलता जब मैं खेल के एक आयोजन के बारे में मेयोहाल गया था। वहां खेल अधिकारी ने मेरा परिचय कराया, 'ही इज फादर ऑफ श्रद्धा।' तब मुझे बहुत ही खुशी मिली।
मेरे लिए यह सुखद है कि तमाम मौकों पर मेरी पहचान मेरी बेटियों से हुई। यह नई पहचान मैं हमेशा सहेजना चाहूंगा क्योंकि किसी भी पिता के लिए यह गर्व की बात है। सच तो यह कि उनकी सफलता में मां का श्रेय ज्यादा है।
उन्होंने उन्हें संस्कारवान और सुयोग्य बनाया। हां, एक शिक्षक की बेटियां होने के कारण उन्हें मेरी ओर से पढऩे की पूरी आजादी मिली। मैंने उन्हें जरूरत की किताबें दिलाने की हर संभव कोशिश की।
मेरी सभी बेटियां मेधावी और लक्ष्य के प्रति जागरूक रहीं, इसीलिए मेरी हिम्मत भी बढ़ती गई। बेटा त्रयंबक भी आईईएस है और रेलवे में सेवारत है। मेरा मानना है कि बेटियों को रोकें नहीं, अच्छे संस्कारों के साथ आगे बढऩे की पूरी आजादी दें।
प्रोफेसर जटाशंकर (अध्यक्ष), दर्शनशास्त्र विभाग- इलाहाबाद विश्वविद्यालय