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कहां गए मुलायम के एक हजार हाथ?
अमर उजाला लखनऊ
Updated Mon, 09 Sep 2013 11:10 AM IST
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समाजवादी पार्टी के मुखिया मुलायम सिंह ने एक बार कहा था, सरकार के हजार हाथ होते हैं।
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लेकिन मुजफ्फरनगर में हिंसा भड़कने के बाद और अब दंगे की शक्ल ले चुके माहौल को काबू करने में प्रदेश सरकार के जो हाथ दिखने चाहिए थे, वे नहीं दिखे।
हजार हाथों में से कुछ हाथ दिख भी रहे हैं, तो वे दंगाइयों के आगे समर्पण की मुद्रा में खड़े हैं या फिर विनती की मुद्रा में जुड़े हुए। बस करो अब रहने दो। समाज को मत बांटो।
समाज को बांटने वाले से सावधान रहो। क्या दंगाइयों के आगे हाथ जोड़ने से हालात सुधर जाएंगे? क्या ऐसी अपीलों से कभी दंगे शांत हुए हैं? क्या दंगाइयों पर ऐसी अपीलों का असर होता है? शायद नहीं!
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सरकार और शासन ने शायद सख्ती दिखाई होती तो हालात इतने नहीं बिगड़ते। ये सख्ती तभी दिखनी चाहिए थी जब इस सरकार के आने के बाद पहली बार सांप्रदायिक सौहार्द्र बिगाड़ने की कोशिश हुई थी, लेकिन दुर्भाग्य से ऐसा नहीं हुआ।
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दंगाइयों के हौसले बुलंद हैं। वे जानते हैं कि शासन और प्रशासन उनकी गिरेबान तक आसानी से नहीं पहुंच सकता। ऐसे लोगों की शिनाख्त और सख्ती में कहीं न कहीं लापरवाही हुई है कि आज प्रदेश के कोना-कोना दंगे के दंश का दर्द झेल रहा है।
आरोप समस्या को सियासी चश्मे से देखने के भी लग रहे हैं। हालात इतने खराब हैं कि सौहार्द्र बिगड़ने के बाद भी इस पर सियासी बयान आ रहे हैं।
दुर्भाग्यजनक है कि जिनके ऊपर इस समस्या को हल करने की जिम्मेदारी है, वे भी इसे सियासी मसला बनाकर पेश कर रहे हैं। क्या सरकार के हजारों हाथ अपने खिलाफ सियासी साजिश को नाकाम कर पाने में भी नाकाम हो रहे हैं?
क्या सचमुच विपक्ष सरकार से ताकतवर है? इतनी ताकतवर कि प्रदेश को बार-बार सांप्रदायिक आग में झोंक दे रही है और हजार हाथों वाली सरकार बेबस हो जा रही है?
अगर नहीं तो सत्ताधारी पार्टी के नेताओं को ऐसे बयान जारी करने से पहले सोचना होगा कि वे ऐसे बयानों के जरिए किसे भरमाना चाहते हैं? किसको बताना चाहते हैं कि सरकार से ईर्ष्या रखने वाले लोगों की ताकत बढ़ती जा रही है और उनके मंसूबे लगातार कामयाब हो रहे हैं?