इतिहास रच रही हैं ये मुस्लिम लड़कियां, पढ़िए इनकी कहानी
खबरें लगातार पढ़ने के लिए अमर उजाला एप डाउनलोड करें
या
वेबसाइट पर पढ़ना जारी रखने के लिए वीडियो विज्ञापन देखें
अगर आपके पास प्रीमियम मेंबरशिप है तो
मुस्लिम समुदाय में बदलाव की बयार दिखने लगी है। अमूमन पुरुष ही कारी बनते थे, लेकिन अब लड़कियां भी कारी बनने में दिलचस्पी दिखा रही हैं। कारी बनकर वे महिलाओं के लिए होने वाले दीनी जलसों में केरात (पारंपरिक उच्चारण) के साथ उन्हें कुरान सुना और समझा सकेंगी।
मुरादाबाद के कोहिनूर तिराहा स्थित मदरसा जामियातुल कारियात फैजाने पंजतन पाक में कई लड़कियां पूरे हौंसले के साथ केरात का हुनर सीख रहीं हैं। ये कारी होने के बाद दीनी खिदमत को अंजाम देंगी।
मदरसा जामियातुल कारियात फैजाने पंजतन पाक शहर के उन गिने चुने मदरसों में शामिल है, जहां मुस्लिम लड़कियां बुलंद इरादों के साथ कुरान को पारंपरिक तरीके से पढ़ने का सलीका सीख रही हैं। मदरसे के बानी कारी हाशिमुल कादरी और उनकी पत्नी कारिया नासिरा खातून इन लड़कियों को इसके तौर-तरीके सिखा रहे हैं।
दीनी प्रोग्राम की शुरुआत करते हैं कारी
कारी हाशिमुल कादरी बताते हैं मदरसे में महानगर के मुगलपुरा, करुला, मकबरा, मंडी चौक सहित कई मोहल्लों से लड़कियां तालीम हासिल करने आती हैं। हर साल की तादाद बढ़ रही है। इन्हें हिफ्ज, आलिम, कारी और मुफ्ती बनने की तालीम दी जा रही है।
जिस तरह आलिम और मुफ्ती की पढ़ाई होती है, उसी तरह कारी के कोर्स भी होते हैं। कुरान के किस हर्फ का उच्चारण पेट से करना है, किसको जुबान से, किसका उच्चारण तालू से और किसका गले से करना है, ये केरात के हुनर में शामिल है।
किसी भी दीनी प्रोग्राम की शुरुआत तिलावते कुरान-ए-पाक से होती है। आमतौर पर कुरान-ए-पाक की तिलावत के लिए कारी को ही बुलाया जाता है। क्योंकि कारी कुरान के एक-एक हर्फ को उसके हक की अदायगी के साथ पढ़ता है।