64 फाइलों से उठा परदा, मगर बोस की मौत की गुत्थी अनसुलझी
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पश्चिम बंगाल सरकार द्वारा नेताजी सुभाष चंद्र बोस से जुड़ी 64 गोपनीय फाइलें सार्वजनिक की गई हैं। इन फाइलों से यह संकेत तो मिलता है कि वह शायद 1945 के बाद भी जीवित थे, लेकिन इनमें नेताजी के आखिरी दिनों के बारे में या उनकी मौत के बारे में कोई बात नहीं है। ऐसे में उनकी मौत की गुत्थी आज भी अनसुलझी ही है।
इससे अब यह सवाल उठने लगा है कि कहीं ये फाइलें खोदा पहाड़ निकली चूहिया वाली कहावत तो नहीं चरितार्थ कर रही हैं। इनमें नेताजी से संबंधित जानकारियां कम ही हैं।
ज्यादातर सूचनाएं उनकी आजाद हिंद फौज, परिवार की जासूसी और द्वितीय विश्वयुद्ध के दौरान की हैं। नेताजी के परिजनों का दावा है कि केंद्र सरकार के पास रखी फाइलों से ही नेताजी की रहस्यमय गुमशुदगी से परदा उठ सकता है।
राज्य सरकार की ओर से जारी एक फाइल में 15 मई, 1940 को कोलकाता से सटे उत्तर 24-परगना जिले में द्वितीय विश्वयुद्ध के बारे में नेताजी के भाषण की प्रति है।
बोस की मौत पर नेहरू ने की थी कई घोषणाएं
इसके अलावा वर्ष 1953 में तत्कालीन प्रधानमंत्री जवाहर लाल नेहरू की ओर से नेताजी की मौत के बारे में संसद में की गई घोषणा की अखबारी क्लिपिंग भी इनमें शामिल हैं। वैसे, इन फाइलों से एक बात साफ है कि सुभाष चंद्र बोस के बड़े भाई शरतचंद्र बोस पर लगातार खुफिया निगाह रखी जा रही थी।
1950 में उनकी मौत के बाद भी बोस परिवार पर खुफिया एजेसियों की लगातार निगाह थी। शरतचंद्र व उनके दोनों पुत्रों- अमिय नाथ और शिशिर कुमार से संबंधित कम से कम सात फाइलों से साफ है कि तत्कालीन केंद्र सरकार व बंगाल में विधान चंद्र राय की सरकार के निर्देश पर पुलिस और दूसरी खुफिया एजेसियां बोस परिवार की लगातार निगरानी कर रही थीं।
यह सिलसिला वर्ष 1971 तक जारी रहा। इन फाइलों में वह पत्र भी हैं, जिसने देश की आजादी के दो साल बाद नेताजी के समर्थकों में उनके जीवित होने की उम्मीद जगा दी थी। यह पत्र एक रेडियो प्रसारण के बारे में है।
पता लगाना मुश्किल काम नहीं
नेताजी के भतीजे अमिय नाथ बोस ने अपने भाई शिशिर कुमार बोस को लिखे इस पत्र में कहा है कि बीते एक महीने से शॉर्ट वेब रेडियो पर लगातार एक विचित्र प्रसारण सुनने को मिल रहा है।
उसमें बांग्ला में बार-बार एक ही लाइन दोहराई जा रही है कि नेता सुभाष चंद्र बोस ट्रांसमीटर पर बात करना चाहते हैं। 18 नवंबर, 1949 को लिखा वह पत्र कोलकाता पुलिस की विशेष शाखा के हाथों लगा था।
शिशिर उस समय लंदन में मेडिकल की पढ़ाई कर रहे थे जबकि अमिय कोलकाता में रहते थे। अमिय ने पत्र में आगे लिखा था कि यह पता नहीं कि वह प्रसारण कहां से हो रहा है क्योंकि उसमें जगह का कोई जिक्र नहीं है, लेकिन उसका पता लगाना कोई मुश्किल काम नहीं है।
नेताजी से जुड़े दस्तावेज पर केंद्र सोच-विचार के बाद लेगा निर्णय
संसदीय मामलों के मंत्री एम वेंकैया नायडू ने कहा कि देश के लोगों को नेताजी सुभाष चंद्र बोस के मसले से जुड़ी बातें जानने का पूरा अधिकार है। उन्होंने इसे अपनी निजी राय बताया।
नायडू ने कहा कि नेताजी से जुड़े गोपनीय दस्तावेजों को सार्वजनिक करने का निर्णय लेने से पहले अन्य देशों के साथ भारत के संबंधों पर पड़ने वाले प्रभावों का अध्ययन किया जाएगा।
उन्होंने कहा कि पश्चिम बंगाल सरकार ने नेजाती से जुड़े कुछ गोपनीय दस्तावेजों को सार्वजनिक किया है। यह अच्छी बात है। हालांकि, इस बात का अध्ययन किए जाने की जरूरत भी है कि अगर केंद्र सरकार ऐसा कोई निर्णय लेती है तो अंतरराष्ट्रीय समुदाय, पड़ोसी और अन्य देशों पर उसका क्या असर होगा।