यू टर्न के मास्टर हैं मुलायम, पुरानी पल्टियों का है इतिहास
समाजवादी पार्टी मुखिया मुलायम सिंह यादव का मौजूदा यू टर्न सियासी मजबूरी हो सकता है, लेकिन पलटी खाने का उनका पुराना इतिहास रहा है। ललितगेट और व्यापम के मसले पर विपक्ष ने पखवाड़े भर से केंद्र सरकार को घेर रखा था। केंद्र ने विपक्ष की एकता को तोड़ने की कई कोशिशें की, सर्वदलीय बैठकें भी बेनतीजा रहीं। विपक्ष ने जैसे तेवर दिखाए थे, उससे ऐसा लग रहा था कि मानसून सत्र में कामकाज करा पाना केंद्र के बूते की बात नहीं है।
विदेशमंत्री सुषमा स्वराज के इस्तीफे के कयास भी लग रहे थे। हालांकि राजनीतिक जानकारों का मानना था कि विपक्ष की सबसे कमजोर कड़ी मुलायम सिंह यादव ही हैं, अबकि बार भी वह यू टर्न ले सकते हैं।
मुलायम ने महिला बताकर सुषमा स्वराज को चंद दिनों पहले ही क्लीन चिट दे दी थी, सोमवार को उन्होंने संसद में हो रहे विरोध प्रदर्शनों को औचित्यहीन बताकर कांग्रेस को अलग-थलग कर दिया। मुलायम ने सदन चलाने की वकालत कर केंद सरकार को राहत दी और प्रधानमंत्री मोदी की तारीफ भी बटोर ली। मुलायम सिंह की इस पलटी का राजनीतिक गुणा-गणित हो सकता हैं, लेकिन उससे पहले पढ़िए उन्होंने कब-कब लिय है यू टर्न-
ममता को पढ़ा दिया था सियासत का ककहरा
मुलायम सिंह यादव पिछली लोकसभा में यूपीए सरकार के बगलगीर थे। हालांकि 2012 के राष्ट्रपति चुनावों में उन्होंने यूपीए सरकार से अलग होकर अपना राष्ट्रपति उम्मीदवार खड़ा करने के संकेत दिया। कांग्रेस से खफा तृणमूल कांग्रेस की सुप्रीमो ममता बनर्जी ने भी उनका हाथ थाम लिया।
ममता राष्ट्रपति चुनावों के लिए रणनीति तय करने के लिए दिल्ली आईं। हालांकि मुलायम सिंह यादव ने उन्होंने जैसा राजनीतिक ककहरा पढ़ाया, वह शायद जीवन भर न भूल पाएं।
सपा प्रमुख ने ममता बनर्जी के साथ बैठक कर राष्ट्रपति पद के संभावित उम्मीदवारों के रूप में तत्कालीन प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह, पूर्व लोकसभा स्पीकर सोमनाथ चटर्जी और पूर्व राष्ट्रपति डा एपीजे अब्दुल कलाम के नाम तय किए। मुलायम-ममता के गठजोड़ से दिल्ली की सियासत सरगर्म हो ही रही थी कि मुलायम ने पलटी खा ली।
मुलायम ने राष्ट्रपति चुनावों में ममता बनर्जी का सहयोग करने से मना कर दिया और कांग्रेस के उम्मीदवार के समर्थन में आ गए।
वाम दलों को भी चखाया था पलटी का स्वाद
मुलायम ने 2008 में वामदलों को भी अपनी पलटी का स्वाद चखाया था। वाम दल, बीजेपी, सपा समेत कई दल भारत-अमेरिका परमाणु समझौते के खिलाफ थे।
वाम दलों के बाहरी सहयोग से ही यूपीए सरकार टिकी हुई थी। समझौते को रोकने के लिए वाम दल यूपीए सरकार के खिलाफ अविश्वास प्रस्ताव लेकर आए। मुलायम सिंह यादव ने शुरुआत में वाम दलों के सहयोग का संकेत दिया। हालांकि लोकसभा में मुलायम पलट गए और सरकार बच गई।
वामदलों को मुलायम ने 2002 में भी गच्चा दिया था। संयुक्त मोर्चा का हिस्सा होने के चलते ने मुलायम ने वाम दलों द्वारा तय किए गए राष्ट्रपति उम्मीदवार के समर्थन का आश्वासन दिया। लेकिन अंतिम समय में उन्होंने वाम दलों की उम्मीदवार कैप्टन लक्ष्मी सहगल के बजाय राष्ट्रीय जनतांत्रिक गठबंधन के उम्मीदवार डा एपीजे अब्दुल कलाम का समर्थन कर दिया। वैसे कलाम का राष्ट्रपति उम्मीदवार के रूप में नाम मुलायम ने ही प्रस्तावित किया था।