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सियासी गोटें फिट करने को तो नहीं हुए ‘मुलायम’

Mon, 24 Sep 2012 09:13 AM IST
अखिलेश वाजपेयी/लखनऊ
अखिलेश वाजपेयी/लखनऊ Updated Mon, 24 Sep 2012 09:13 AM IST
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mulayam singh making a political strategy

पुत्र मुख्यमंत्री अखिलेश यादव प्रधानमंत्री डॉ. मनमोहन सिंह पर हमला बोल रहे हैं और पिता मुलायम सिंह यादव उन्हीं मनमोहन सिंह के नेतृत्व वाली सरकार को न गिरने देने का ऐलान कर रहे हैं। देश की सियासत इस समय रोज नई करवट ले रही है। मुलायम उसके केंद्र में हैं। उनका हर दिन बदलता रुख सियासी हलचल तेज किए है। एफडीआई के मुद्दे पर सरकार के खिलाफ मुलायम का सड़क पर संघर्ष हकीकत है या केंद्र सरकार न गिरने देने का ऐलान। आम आदमी इसमें उलझ गया है। इस उलझन को मुलायम की इस बात ने और बढ़ा दिया है कि सपा एफडीआई पर संसद में सरकार के खिलाफ प्रस्ताव भी ला सकती है।

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राजनीतिक विश्लेषकों की मानें तो कुश्ती में चरखा दांव के माहिर मुलायम सियासत में भी इसी दांव को आजमाने की कोशिश में हैं। वह सियासी समीकरणों को इतना गड्मड्ड कर देना चाहते हैं कि सभी उसमें उलझकर रह जाएं। खासतौर से कांग्रेस या बसपा को तो वह पूरी तरह भ्रमित करके रखना चाहते हैं, जिससे दोनों पार्टियों के बीच कोई राजनीतिक खिचड़ी न पक पाए। इसमें वह अभी तक कामयाब भी होते दिख रहे हैं।
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उनकी कोशिश अपने दांव में सबको उलझाकर लोकसभा चुनाव की सारी तैयारियां पूरी कर लेने की है। इसके बाद ही वह लोकसभा चुनाव की नौबत आने देना चाहते हैं। यही वजह है कि वह एक दिन कुछ तो दूसरे दिन कुछ बयान दे रहे हैं। समय और परिस्थितियां भी उनका साथ दे रही हैं। कांग्रेस उनके दांव में उलझती जा रही है।
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भविष्य पर नजर
मुलायम का प्रयास है कि चुनाव बाद केंद्र में गैर कांग्रेसी और गैर भाजपा सरकार बनने की नौबत आए तो वामपंथी संगठनों से लेकर कांग्रेस तक उनका समर्थन करने को मजबूर रहे। वह जानते हैं कि कांग्रेस के समीकरण गड़बड़ाए तो भाजपा को सत्ता में आने से रोकने के लिए वह तीसरे विकल्प के साथ खड़े होने को मजबूर होगी। इसलिए वह कांग्रेस से रिश्तों को पूरी तरह बिगाड़ना नहीं चाहते लेकिन वामपंथी दल बिदक न जाएं इसलिए कांग्रेस विरोध भी करते दिखना चाहते।

दूध के जले छाछ भी फूंक-फूंक कर पी रहे
मुलायम अभी तक यह भूल नहीं पाए हैं कि 1997 में देवगौड़ा के बाद वह सिर्फ इसलिए प्रधानमंत्री नहीं बन पाए थे क्योंकि कांग्रेस इंद्रकुमार गुजराल को लेकर नरम थी। तीसरे मोरचे की सरकार बनने की नौबत आई तो प्रधानमंत्री पद की दौड़ में वही आगे होगा, जिसको लेकर कांग्रेस का रुख नरम होगा। इसलिए भी वह कांग्रेस पर दबाव बनाने के बावजूद रिश्तों को भी मधुर बनाए रखना चाहते हैं।

तैयारियां पूरी करने के लिए चाहिए वक्त
चुनाव बाद अगर मुलायम को प्रधानमंत्री पद की दौड़ पर दूसरों से आगे रहना है तो उन्हें उत्तर प्रदेश से ज्यादा से ज्यादा सीटें चाहिए होंगी। यह तभी होगा जब चुनाव में अच्छी छवि और जिताऊ उम्मीदवार मैदान में उतरें। मुलायम के विश्वासपात्र लोग दमदार व जिताऊ प्रत्याशियों की तलाश के काम पर लगे हैं। पर, यह काम पूरा होने में अभी थोड़ा वक्त लग रहा है। वह यह काम पूरा होने के बाद ही चुनाव चाहते हैं।

भावी दोस्तों की तलाश
सपा मुखिया की कोशिश है कि चुनाव की घोषणा होने से पहले वह भावी दोस्तों की तलाश का काम पूरा कर लें जो चुनाव बाद केंद्र में सरकार बनाने में मदद करें या तटस्थ रहकर काम आसान बनाएं। जिस तरह ममता ने सरकार का साथ छोड़ा और राष्ट्रवादी कांग्रेस पार्टी ने एफडीआई पर बहस की बात उठाई है उससे मुलायम का उत्साह बढ़ना स्वाभाविक है। सामान्य तौर पर भले ही यह लग रहा हो कि वामपंथी संगठनों के कारण ममता व मुलायम एक साथ नहीं आ सकते। पर, जिस तरह ममता की कांग्रेस से अनबन हुई है और गंगा यात्रा को लेकर उमा के साथ तनातनी शुरू हुई है उसके मद्देनजर इस संभावना से इन्कार नहीं किया जा सकता।

मुलायम का पंजाब के उपमुख्यमंत्री सुखवीर सिंह बादल से मिलना और राष्ट्रवादी कांग्रेस की तरफ से एफडीआई पर बहस की मांग के बाद सपा की तरफ से भी संसद में प्रस्ताव लाने का ऐलान भी इसी कोशिश का हिस्सा है।


महत्वपूर्ण है यह मौन
एक समाचार चैनल पर 2014 तक केंद्र को समर्थन पर सपा मुखिया मुलायम सिंह यादव का मौन भी इसी का संकेत देता है कि उनका समर्थन सिर्फ सियासी चौसर पर सोच-समझकर गोटें सजाने में लग रहे समय तक ही है। इस दौरान वह ऐसी परिस्थितियां खड़ी कर देना चाहते हैं कि सरकार के अन्य कुछ साथी भी उसका साथ छोड़ दें।

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