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इस बार साकार होगा मुलायम का 'सपना'?

Wed, 05 Feb 2014 06:53 PM IST
नितिन श्रीवास्तव/बीबीसी संवाददाता
नितिन श्रीवास्तव/बीबीसी संवाददाता Updated Wed, 05 Feb 2014 06:53 PM IST
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उत्तर प्रदेश में हुए 2012 के विधानसभा चुनावों में समाजवादी पार्टी ने अपने ही रिकॉर्ड को बेहतर किया था।

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राज्य की 403 सदस्यों वाली विधानसभा में मुलायम सिंह यादव के उम्मीदवारों ने 224 सीटों पर जीत हासिल की और बहुजन समाज पार्टी की सरकार को बाहर का रास्ता दिखाया।

नतीजे आने के बाद सबसे बड़ा सवाल यही था कि अब सपा की तरफ़ से मुख्यमंत्री कौन बनेगा। पार्टी संस्थापक मुलायम सिंह का नाम तो सर्वप्रथम था ही, साथ में उनके बेटे अखिलेश यादव का भी नाम तूल पकड़ रहा था।
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वजह थी प्रदेश में चुनावों के पहले निकल चुकी अखिलेश की सफल 'साइकिल यात्रा'।

अखिलेश को दे डाली सूबे की कमान

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उत्तर प्रदेश के वोटरों के पास 1992 के बाद समाजवादी पार्टी के एक युवा और साफ़ छवि वाले युवा नेता का विकल्प बन कर उभरे थे मुलायम के बेटे अखिलेश।

ख़ुद समाजवादी पार्टी में भी रामगोपाल यादव जैसे दिग्गजों ने अखिलेश को मुख्यमंत्री बनाए जाने पर कमर कस ली थी। आख़िकार मुलायम सिंह ने सबकी बात मानते हुए अखिलेश को प्रदेश की कमान दे डाली।

जानकार बताते हैं कि इसके पीछे मुलायम सिंह का भी एक लंबा 'सपना' रहा है। सपना प्रधानमंत्री बनने का। मुलायम ने कभी अपने इस अरमान पर अगर खुल कर लंबी बात नहीं की है, तो इससे परहेज़ भी नहीं जताया है।

आम चुनाव

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लेकिन 2012 की अपनी ऐतिहासिक जीत के बाद से लेकर फ़रवरी 2013 तक सपा के लिए प्रदेश में चीज़े काफ़ी आगे बढ़ चुकी हैं।

80 लोकसभा सीटों वाले इस प्रदेश में फिलहाल तो आलम यही है कि समाजवादी पार्टी के लिए अपनी मौजूदा 22 सीटों के आंकड़े को दोबारा पार करने की चुनौती है।

ख़ुद समाजवादी पार्टी को क़रीब से जानने वाले बताते हैं कि डेढ़ साल में अखिलेश सरकार प्रदेश के आम लोगों का मन जीतने में सफल तो बिलकुल नहीं रही है।

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सपा सरकार की छवि धूमिल

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वजह भी एक नहीं है। जब से सपा की सरकार बनी है, तब से प्रदेश में कम से कम दस जगहों पर कथित तौर से सांप्रदायिक हिंसा हुई है।

इनमे मथुरा, टांडा, बुलंदशहर, प्रतापगढ़ और सबसे ऊपर क्लिक करें मुज़फ़्फ़रनगर जैसे ज़िले प्रभावित हुए हैं।

मीडिया में इन कथित वारदातों की भरपूर कवरेज ने अखिलेश सरकार की नींद यहाँ तक उड़ा दी थी कि कुछ दिन पहले उन्होंने 'अपने ख़िलाफ़ चल रही मुहिम पर रोष भी जताया' था।

मुलायम सिंह के पैतृक इलाक़े सैफई में हुए सालाना सांस्कृतिक उत्सव ने भी सपा सरकार को नुक़सान पहुंचाया है।

कैसे बनेंगे पीएम?

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आलोचकों ने कहा कि एक तरफ़ दंगों में बेघर हुए लोगों के रहने-खाने के इंतज़ाम पर सवाल उठ रहे थे और दूसरी तरफ़ सपा सरकार बॉलीवुड सितारों वाले इस कार्यक्रम पर करोड़ों खर्च कर रही थी।

विपक्ष ने भी इस मामले को जम कर उठाने में कोई कसर नहीं छोड़ी है। लखनऊ में लोगबाग इस ओर भी इशारा करते हैं कि ख़ुद समाजवादी पार्टी के भीतर 'सब ठीक नहीं है'।

मुलायम सिंह के भाई शिवपाल यादव और मुख्यमंत्री अखिलेश के बीच के संबंध कितने मधुर हैं, ये भी क़यास का विषय रहा है।

आजम खान ने भी जताई थी नाराजगी

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रामपुर से क़द्दावर नेता आज़म ख़ान और अखिलेश यादव के बीच आतंरिक मतभेद दूर करने के लिए एक-दो बार ख़ुद मुलायम को आगे बढ़ना पड़ा है।

इन सबके बीच केंद्र में सरकार बनाने के लिए तीसरे मोर्चे पर भी काम शुरू हो चुका है।

रहा सवाल मुलायम सिंह यादव का, तो उनके लिए अगर 'प्रधानमंत्री बनने की आस' बरकरार रखनी है तो उसके लिए सपा को आगामी चुनावों में 2009 से भी बेहतर प्रदर्शन करना होगा।

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