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'मोदी के ठंडे तेवरों से अचंभे में हैं घोर समर्थक'

Sat, 02 Aug 2014 06:18 PM IST
प्रमोद जोशी,वरिष्ठ पत्रकार/बीबीसी हिंदी डॉटकॉम के लिए
प्रमोद जोशी,वरिष्ठ पत्रकार/बीबीसी हिंदी डॉटकॉम के लिए Updated Sat, 02 Aug 2014 06:18 PM IST
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नरेंद्र मोदी की सरकार ने पहले दो महीनों में अपने विरोधियों को जितने विस्मय में डाला है, उससे ज्यादा भौंचक्के उनके कुछ घनघोर समर्थक हैं। ख़ासतौर से वे लोग जिन्हें बड़े फ़ैसलों की उम्मीदें थीं।

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सरकार बनने के बाद मोदी की रीति-नीति में काफ़ी बदलाव हुआ है। सबसे बड़ा बदलाव है मीडिया से बढ़ती दूरी। मीडिया की मदद से सत्ता में आए मोदी शायद मीडिया के नकारात्मक असर से घबराते भी हैं।
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फुलझड़ियों की तरह फूटते उनके बयान गुम हो गए हैं। पर सबसे रोचक है उन विशेषज्ञों को लगा सदमा जो भारी बदलावों की उम्मीद कर रहे थे। कोई बात है कि कुछ महीने पहले तक बेहद उत्साही मोदी समर्थकों की भाषा और शैली में ठंडापन आ गया है।
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समर्थकों को नहीं भाया स्मृति को मंत्रालय देना

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शुरुआत मोदी की कट्टर समर्थक मानी जाने वाली मधु किश्वर ने की थी। उन्होंने स्मृति ईरानी को मानव संसाधन मंत्री बनाए जाने का खुलकर विरोध किया।

बहरहाल उन्होंने जो तीखी बातें कही हैं, वे ज्‍यादातर स्मृति ईरानी के बाबत हैं, सीधे मोदी के ख़िलाफ़ नहीं। स्मृति ईरानी को बढ़ावा देने में मोदी का ही हाथ है।

उनके ये तीर क्या परोक्ष रूप में मोदी के ख़िलाफ़ नहीं हैं? मधु किश्वर का कहना है कि मैं उन लोगों में से नहीं जो हर बात का ख़ामोशी से समर्थन करते हैं। भाजपा के लोग चाहें तो मुझे अपना विपक्ष मान सकते हैं।

एम जे अकबर ने भी उठाया सवाल

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एमजे अकबर संजीदा पत्रकार हैं और पार्टी प्रवक्ता भी हैं। इस हफ्ते ‘संडे गार्डियन’ में उनके कॉलम का शीर्षक है ‘जुलाई इज़ अ वोलेटाइल मंथ।’ जुलाई के रूपक का इस्तेमाल करके उन्होंने महाराष्ट्र सदन में शिवसेना के कुछ सांसदों द्वारा एक रोज़ेदार मुस्लिम कर्मचारी का मामला उठाया है।

संभव है उनका उद्देश्य केवल सांसदों के आचरण पर उंगली उठाना ही हो, उसके आगे कुछ नहीं। पर उन्होंने अपनी बात कहने के लिए मोदी के चुनाव अभियान और संसद में दिए गए वक्तव्यों का सहारा लिया है।

उन्होंने मोदी की रीति-नीति की आलोचना नहीं की, बल्कि उनके संदेश की मूल भावना का ही ज़िक्र किया है, पर एक सहयोगी दल के सांसदों के आचरण पर गंभीर सवाल उठाए हैं।

इस वक्‍त अकबर केवल पत्रकार नहीं, बल्कि पार्टी संगठन से जुड़े व्यक्ति हैं। उनकी बात का औपचारिक मतलब होता है और उनके मंतव्य को लेकर मीन-मेख़ संभव है।

कांग्रेसी राह पर ही चलना है क्या?

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स्वप्न दास गुप्ता का शुमार वाम-विरोधी लेखकों-विचारकों में होता है। वे भाजपा के क़रीबी माने जाते हैं और मोदी के प्रशंसक भी। उन्होंने हाल में केंद्रीय बजट और सरकार की पश्चिम एशिया नीति को लेकर आलोचनात्मक टिप्पणियां की हैं।

अंग्रेज़ी दैनिक ‘टाइम्स ऑफ़ इंडिया’ के अपने कॉलम ‘राइट एंड रॉंग’ में उन्होंने लिखा है कि हाल में संसद से इसराइल विरोधी प्रस्ताव पास न करने और फिर संयुक्त राष्ट्र मानवाधिकार आयोग में प्रस्ताव के पक्ष में वोट देने के बीच विसंगति है। तार्किक रूप से भारत को जिनेवा में मानवाधिकार आयोग की बैठक में अनुपस्थित रहना चाहिए था।

स्वप्न दास गुप्ता की राय है कि विदेश नीति के मामले में ब्रिक्स सम्मेलन तक भी भारत का रुख़ परंपरागत नीति के अनुरूप था।

पर वे तंज़ भरे अंदाज़ में लिखते हैं- ''यदि मोदी सरकार ने तय किया है कि भारतीय विदेश नीति के बुनियादी सिद्धांत बदले नहीं जाएंगे और जवाहरलाल नेहरू, इंदिरा गांधी और राजीव गांधी ने जो प्राथमिकताएं तय की थीं, उन पर ही चला जाएगा तो फिर कहने को कुछ रह नहीं जाता।

राजनीतिक दिशा विदेश नीति की पहली दरकार होती है, जो अभी तक नज़र नहीं आती।'' विदेश नीति ही नहीं उन्होंने अरुण जेटली के बजट की भी पर्याप्त घिसाई की है।

दो हफ्ते पहले इसी कॉलम में उन्होंने सरकारी निरंतरता पर तंज़ कसते हुए लिखा कि इसका मतलब है कि सरकारी बाबू सरकार चलाएंगे।

बाबू चला रहे हैं सरकार!

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मोदी सरकार के बजट को कांग्रेसी बजट तो स्वामीनाथन अंकलेसरैया अय्यर ने भी बताया, पर अरविंद पनगरिया भी कहते हैं कि बाबू लोग अरुण जेटली को हाँक ले गए।

अरविंद पनगरिया के अनुसार इस बजट में कुछ बातें चिदंबरम प्रणाली से बेहतर हैं। मसलन टैक्स विवादों के निपटारे या इंफ्रास्ट्रक्चर निर्माण की गति तेज़ करने या उद्यमिता बढ़ाने का विचार अच्छा है, पर राजकोषीय घाटे को 4।1 फ़ीसदी पर रखने की चिदंबरम योजना पर चलना ग़लत है।

पनगरिया कहते हैं कि अगले फ़रवरी में देखना होगा कि बजट किसी दृष्टि या दिशा का संकेत देता है या उन नौकरशाहों की दृष्टि दिखाएगा जिन्हें निरंतरता ही भाती है।

मोदी ख़ामोश क्यों?

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नरेंद्र मोदी के पहले दो महीने ख़ामोशी से बीते हैं। मोदी का जन-संपर्क चुनाव के पहले जैसा था, वैसा अब नहीं है। हाल में ब्रिक्स सम्मेलन में जाते वक्त वे अपने साथ पत्रकारों का दल नहीं ले गए।

इस बात के सकारात्मक पहलू हैं तो कुछ नकारात्मक बातें भी हैं। मनमोहन सिंह ने भी मीडिया से दूरी रखी थी। अंततः तमाम सच्ची-झूठी बातें मीडिया में आती रहीं।

मोदी सरकार के ये शुरुआती दिन हैं। शायद सरकार स्थिति को अपने क़ाबू में लाने की कोशिश में कुछ वक्त ले रही हो, पर ऐसा लगता है कि जिन्हें उम्मीदें थीं वे निराश होने लगे हैं।
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